हाइटेक शहर, पानी के आगे बेबस: आखिर क्यों हर मानसून में डूब जाते हैं महानगर?

El-Nino के प्रभाव से मानसून की रफ्तार भले ही शुरुआत में धीमी रही, लेकिन अगस्त की शुरुआत में हुई तेज बारिश ने देश के कई हाईटेक शहरों की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुग्राम में भारी बारिश के बाद सड़कें जलमग्न हो गईं, जिससे कई कंपनियों को कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम लागू करना पड़ा। वहीं दिल्ली में भी जलभराव की तस्वीरों ने आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और ड्रेनेज सिस्टम की कमियों को उजागर कर दिया।

हालांकि, यह कोई नई कहानी नहीं है। पिछले कई वर्षों से हर मानसून के साथ देश के बड़े और आधुनिक शहरों की यही तस्वीर सामने आती रही है। पटना (2019), बेंगलुरु (2024), दिल्ली (2023), मुंबई (2020) और चेन्नई (2015) में भी भारी बारिश के बाद सड़कें तालाब में बदल गई थीं, यातायात ठप हो गया था और सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए स्मार्ट और हाइटेक शहर कुछ घंटों की बारिश भी क्यों नहीं झेल पाते? बारिश होते ही वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों चरमरा जाता है? और आखिर ऐसी कौन-सी खामियां हैं, जिनकी वजह से हर साल हमारे ‘स्मार्ट सिटी’ कुछ ही घंटों में ‘वाटर सिटी’ बन जाते हैं? आइए, इस कंक्रीट के जाल के पीछे छिपे असली सच और सिस्टम की नाकामी को गहराई से समझते हैं।

अर्बन प्लानिंग के ‘भीष्म पितामह’ क्या कहते हैं?
अर्बन प्लानर डॉ. पी. एस. राणा के मुताबिक, शहरों में बढ़ती फ्लडिंग की सबसे बड़ी वजह प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम से छेड़छाड़ है। जहां कभी पानी के बहाव के रास्ते थे, वहां अब कंक्रीट के निर्माण हो चुके हैं, जिससे बारिश का पानी निकल नहीं पाता। उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण के साथ बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था जरूरी है, लेकिन कई शहरों में इसे नजरअंदाज किया जाता है। खराब प्लानिंग के साथ-साथ रखरखाव की कमी भी हाईटेक शहरों में जलभराव की समस्या को बढ़ा रही है।

गुरुग्राम के मुकाबले नोएडा में स्थिति क्यों बेहतर?
डॉ. राणा भारत के दो सबसे बड़े हाइटेक शहर नोएडा और गुरुग्राम के अर्बन मॉडल में बुनियादी अंतर को इस तरह समझाते हैं—
नोएडा
•विकास सरकारी एजेंसी के जरिए हुआ।
•पहले सड़क, ड्रेनेज और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया।
•उसके बाद सेक्टर और इमारतें विकसित हुईं।
•इसलिए कई इलाकों में ड्रेनेज नेटवर्क अपेक्षाकृत बेहतर है।

गुरुग्राम
•विकास का बड़ा हिस्सा निजी डेवलपर्स ने किया।
•अलग-अलग परियोजनाएं बिना समग्र (Integrated) मास्टर प्लान के विकसित हुईं।
•कई जगह सड़क, सीवर और ड्रेनेज नेटवर्क बाद में जोड़े गए।
•अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी रही।

इसी वजह से गुरुग्राम में थोड़ी तेज बारिश भी बड़े ट्रैफिक जाम और जलभराव का कारण बन जाती है।


दुनिया के बड़े शहरों की क्या है प्लानिंग?

भारत में मानसूनी बारिश पर जलभराव आम है। क्या यही हालात दुनिया के अन्य शहरों में है। जवाब है नहीं! दुनिया के शहरों में मानूसनी बारिश से निपटने के लिए बेहतर व्यवस्था है

जापान के टोक्यो शहर ने शहरी बाढ़ से निपटने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी भूमिगत जल निकासी प्रणालियों में से एक, G-Cans Project तैयार किया है। जमीन से करीब 50 मीटर नीचे बने इन विशाल टनल और वाटर टैंकों में भारी बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी जमा किया जाता है। इसके बाद पंपों की मदद से पानी को सुरक्षित तरीके से बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे शहर को जलभराव से बचाने में मदद मिलती है।

सिंगापुर में भारी बारिश के बावजूद जलभराव की समस्या काफी हद तक नियंत्रित है। इसकी वजह है वहां की आधुनिक वाटर मैनेजमेंट प्रणाली, जहां नालों को प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों में बदला गया है। शहर की सड़कें, पार्क और इमारतें बारिश के पानी को सोखने और स्टोर करने में मदद करती हैं। इस पानी को बड़े रिजरवायर में जमा कर बाद में उपयोग किया जाता है।

नीदरलैंड्स का एम्स्टर्डम शहर में लिविंग विद वाटर तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसमें पानी को रोकने के बजाय उसे शहर में जगह देने की नीति है। इसके तहत छतों पर ‘ग्रीन रूफ्स’, वाटर प्लाजा और पार्किंग लॉट ऐसे बनाए गए हैं जो बारिश के वक्त पानी को अस्थायी रूप से होल्ड करते हैं ताकि ड्रेनेज पाइप्स पर अचानक दबाव न पड़े।

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन ने बारिश से निपटने के लिए खास फ्लड मैनेजमेंट प्लान तैयार किया है। यहां सड़कें, पार्क और सार्वजनिक जगहों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि भारी बारिश के समय वे पानी के अस्थायी रास्ते बनकर शहर को जलभराव से बचा सकें।

भारतीय शहर कहां पिछड़ रहे हैं?
डॉ. पी. एस. राणा के अनुसार, भारतीय शहरों में अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी जलभराव की बड़ी वजह है। सड़क, ड्रेनेज और निर्माण कार्य अलग-अलग विभाग संभालते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था में खामियां रह जाती हैं। वहीं बढ़ते कंक्रीटकरण ने पानी के जमीन में जाने के रास्ते भी कम कर दिए हैं। नतीजा यह है कि तेज बारिश के दौरान पानी सड़कों पर जमा होकर बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर देता है।

शहरों को डूबने से कैसे बचाए जाए?
देश के कई अर्बन प्लानर का मनना है कि भारत में जिस तेजी से शहरीकरण हो रहा है, उस स्थिति में अब सिर्फ नाले साफ करने से बात नहीं बनेगी अगर शहरों को जलप्रलय से बचाना है, तो तीन स्तरों पर काम करना होगा।

प्लानिंग स्तर पर बदलाव करना होगा: पूरे मेट्रोपोलिटन एरिया के लिए ‘मास्टर ड्रेनेज प्लान’ बनना होगा। नेचुरल ड्रेनेज से अतिक्रमण को हटाना होगा।

एक्जीक्यूशन स्तर पर सुधार की जरूरत: सड़कों के निर्माण के साथ ही ड्रेनेज बनाना अनिवार्य करना होगा।

मेंटेनेंस को बढ़ावा दें: पारंपरिक नालों के स्थान पर ‘स्पॉन्ज सिटी’ इंफ्रास्ट्रक्चर (वाटर होल्डिंग पॉन्ड्स, परमीएबल कंक्रीट और ग्रीन बेल्ट) को बढ़ावा देना होगा।

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