10 महीने में 100 इस्तीफे, ISRO छोड़कर कहां और क्यों जा रहे वैज्ञानिक ?

कुछ इसरो वैज्ञानिक निजी स्पेस कंपनियों का रुख कर रहे हैं. देश में अब 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स और करीब 500 मिलियन डॉलर का निवेश हो चुका है. यहां जानिए इसरो वैज्ञानिकों की सैलरी और विदेशों के पैकेज का फर्क.

भारत में प्राइवेट स्पेस सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है और इसका असर अब इसरो पर भी दिखने लगा है. रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के महीनों में कुछ अनुभवी इसरो वैज्ञानिक निजी स्पेस स्टार्टअप्स से जुड़ गए हैं. 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खुलने और 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति के बाद देश में 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स बन चुके हैं, जिनमें करीब 500 मिलियन डॉलर का निवेश हुआ है. हालांकि, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह का कहना है कि इससे इसरो की कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा है. ऐसे में जानिए इसरो वैज्ञानिकों की सैलरी, पे स्केल, सुविधाएं और नासा, ईएसए और जैक्सा से उनकी तुलना.

प्राइवेट स्पेस सेक्टर के बढ़ने से बदला माहौल

भारत में 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने और 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति लागू होने के बाद प्राइवेट स्पेस सेक्टर तेजी से बढ़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अब 400 से ज्यादा पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स हैं, जिनमें करीब 500 मिलियन डॉलर का निवेश हो चुका है. पिक्सेल, ध्रुवा स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी कंपनियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं. इसी दौरान कुछ अनुभवी इसरो वैज्ञानिक भी इन स्टार्टअप्स से जुड़े हैं. हालांकि, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा है कि इसरो का कार्यबल बहुत बड़ा है और “कई लोग आते हैं और कई जाते हैं”, इसलिए इससे एजेंसी की कार्यक्षमता या राष्ट्रीय परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ता. इसी बीच इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉ. एस. सोमनाथ भी अग्निकुल कॉसमॉस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में ऑब्जर्वर के रूप में शामिल हुए हैं.

इसरो में कैसे मिलती है नौकरी और कितना मिलता है शुरुआती वेतन

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में वैज्ञानिक या इंजीनियर बनने के लिए उम्मीदवार के पास 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स होना जरूरी है. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल, कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रिकल, सिविल, एयरोस्पेस या फिजिक्स जैसे विषयों में बीई, बीटेक या संबंधित डिग्री की जरूरत होती है. भर्ती इसरो सेंट्रलाइज्ड रिक्रूटमेंट बोर्ड के जरिए लिखित परीक्षा, इंटरव्यू और दस्तावेज वेरिफिकेशन के आधार पर होती है. सातवें वेतन आयोग के तहत नए साइंटिस्ट या इंजीनियर एससी को पे लेवल 10 में 56,100 रुपये बेसिक सैलरी मिलती है. डीए, एचआरए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस, प्रोफेशनल अपडेट अलाउंस और एनपीएस जैसी सुविधाएं जोड़ने पर कुल मासिक वेतन करीब 95 हजार से 1.07 लाख रुपये तक पहुंच सकता है.

लेवल 10 से 16 तक बढ़ता है पे स्केल, प्रमोशन के साथ बढ़ती है सैलरी

इसरो में वैज्ञानिकों का वेतन पे मैट्रिक्स लेवल के अनुसार तय होता है. शुरुआती नियुक्ति लेवल 10 से होती है और अनुभव के साथ वैज्ञानिक एसडी, एसई, एसएफ, एसजी, एच, आउटस्टैंडिंग साइंटिस्ट और डिस्टिंग्विश्ड साइंटिस्ट जैसे पदों तक पहुंचते हैं. लेवल 11 पर बेसिक सैलरी 67,700 रुपये, लेवल 12 पर 78,800 रुपये, लेवल 13 पर 1,18,500 रुपये, लेवल 13ए पर 1,31,100 रुपये, लेवल 14 पर 1,44,200 रुपये, लेवल 15 पर 1,82,200 रुपये और लेवल 16 पर 2,05,400 रुपये तक बेसिक वेतन मिलता है. प्रमोशन के साथ भत्ते भी बढ़ते हैं, जिससे सीनियर वैज्ञानिकों का सालाना पैकेज 25 से 30 लाख रुपये तक पहुंच सकता है.

नासा, ईएसए और जैक्सा में कितनी मिलती है सैलरी

अगर विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों की बात करें तो वहां का वेतन भारतीय संस्थानों की तुलना में काफी ज्यादा है. स्पेसक्रू और लीपस्कॉलर के अनुसार, अमेरिका की नासा में रिसर्च वैज्ञानिकों की सालाना सैलरी करीब 95 हजार डॉलर से 1.5 लाख डॉलर तक होती है, जो भारतीय रुपये में लगभग 80 लाख से 1.25 करोड़ रुपये बैठती है.

Ziprecruiter के अनुसार, यूरोपियन स्पेस एजेंसी यानी ईएसए में वैज्ञानिकों को 60 हजार से 95 हजार यूरो या इससे अधिक सालाना मिलते हैं, जो करीब 55 लाख से 90 लाख रुपये के बराबर है. लीपस्कॉलर के अनुसार, जापान की जैक्सा में वैज्ञानिकों की औसत सैलरी 35 लाख से 55 लाख रुपये सालाना बताई जाती है. प्राइवेट स्पेस कंपनियों जैसे स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन में पैकेज इससे भी अधिक हो सकता है.

सैलरी कम, लेकिन सुविधाओं में इसरो क्यों माना जाता है मजबूत

वेतन के मामले में इसरो विदेशी एजेंसियों से पीछे जरूर दिखता है, लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं इसकी बड़ी ताकत मानी जाती हैं. वैज्ञानिकों को सीएचएसएस के तहत अपने साथ जीवनसाथी, बच्चों और माता पिता तक के लिए मेडिकल सुविधा मिलती है. इसरो के कई केंद्रों पर रियायती सरकारी आवास, ट्रांसपोर्ट, बच्चों के लिए शिक्षा भत्ता और कैंटीन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. रिटायरमेंट के बाद एनपीएस के साथ मेडिकल सुविधा भी जारी रहती है. यानी विदेशी संस्थानों में हाथ में ज्यादा पैसा मिलता है, लेकिन वहां रहने, इलाज और दूसरी जरूरतों पर खर्च भी काफी अधिक होता है.

नासा और इसरो की सुविधाओं में क्या है सबसे बड़ा अंतर

नासा और दूसरी विदेशी एजेंसियां वैज्ञानिकों को ज्यादा वेतन देती हैं, लेकिन रहने के लिए सरकारी आवास नहीं देतीं. कर्मचारियों को खुद घर किराए पर लेना या खरीदना पड़ता है. मेडिकल सुविधा भी हेल्थ इंश्योरेंस मॉडल पर आधारित होती है, जिसमें कुछ खर्च कर्मचारी को खुद उठाना पड़ता है. इसके उलट इसरो में सरकारी कॉलोनियां, परिवार सहित मेडिकल सुविधा और सामाजिक सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. ईएसए में एक खास सुविधा यह भी है कि वहां कर्मचारियों की बेसिक सैलरी पर नेशनल इनकम टैक्स नहीं लगता. वहीं नासा में रिटायरमेंट के लिए अलग पेंशन और सेविंग सिस्टम लागू है.

फिर भी इसरो क्यों छोड़ रहे हैं वैज्ञानिक ?

रिपोर्टों के मुताबिक हाल के महीनों में करीब 100 से 120 वैज्ञानिक इसरो छोड़ चुके हैं. इनमें यूआर राव सैटलाइट सेंटर और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के अनुभवी वैज्ञानिक भी शामिल बताए गए हैं. माना जा रहा है कि 2020 में निजी स्पेस सेक्टर खुलने और 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति लागू होने के बाद निजी कंपनियों में बेहतर वेतन, नेतृत्व की भूमिका और नए अवसर बढ़े हैं. इसी वजह से अंतरिक्ष विभाग ने 14 जुलाई को नया निर्देश जारी किया है. अब गगनयान और दूसरे राष्ट्रीय महत्व के मिशनों से जुड़े ग्रुप ए वैज्ञानिकों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पर अंतिम फैसला सीधे अंतरिक्ष विभाग स्तर पर लिया जाएगा.

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