US-Iran War: अमेरिका और इजराइल ने जब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, तब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को तबाह करने, उसके परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने और सुप्रीम लीडर की सत्ता समाप्त करने जैसे कई बड़े दावे किए थे। लेकिन मौजूदा हालात में तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। इजराइल अब ईरान के बजाय लेबनान और गाजा पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, जबकि अमेरिका भी लंबे संघर्ष के बाद पीछे हटने के संकेत देता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बावजूद ट्रंप अब परमाणु मुद्दे से लेकर होर्मुज तक समझौते के लिए तैयार नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर हालात यहां तक कैसे पहुंचे कि ईरान इस जंग में बढ़त बनाता दिख रहा है और अमेरिका बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहा है?
ईरान के साथ जंग में अमेरिका को कितना नुकसान?
ईरान के साथ जारी संघर्ष अमेरिका के लिए सैन्य और रणनीतिक तौर पर महंगा साबित होता दिख रहा है। अब तक 20 अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत और 620 से ज्यादा सैनिकों व कॉन्ट्रैक्टरों के घायल होने की बात सामने आई है। वहीं, अमेरिकी वायुसेना और नौसेना को करीब 42 विमानों का नुकसान हुआ है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों में पेट्रियट सिस्टम, THAAD रडार और अन्य निगरानी उपकरणों को भी नुकसान पहुंचा है। लगातार हमलों के चलते अमेरिका के मिसाइल इंटरसेप्टर और सटीक हथियारों का भंडार भी तेजी से घट रहा है, जिससे वॉशिंगटन की सैन्य क्षमता पर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है।
ईरान के साथ टकराव का असर अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। इस सैन्य अभियान पर अब तक करीब 113.3 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। वहीं, फारस की खाड़ी और लाल सागर में बड़ी संख्या में अमेरिकी युद्धपोतों और विमानों की तैनाती से रोजाना का खर्च भी बढ़ रहा है। लगातार बढ़ती लागत ने अमेरिकी बजट पर दबाव और बढ़ा दिया है।
न परमाणु डील न होर्मुज?
‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोल देता है, तो डोनाल्ड ट्रंप बिना किसी परमाणु समझौते के भी पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष खत्म करने पर सहमत हो सकते हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जलमार्ग खुलते ही ट्रंप इसे अपनी जीत के तौर पर पेश करने की तैयारी में हैं। हालांकि, संघर्ष की शुरुआत से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका का रुख सख्त रहा है, लेकिन अब होर्मुज का मुद्दा वार्ता में सबसे बड़ी अड़चन बना हुआ है।
ईरान से क्यों निकलना चाह रहे हैं ट्रंप?
ईरान के साथ संघर्ष को जल्द खत्म करने के पीछे ट्रंप की कई मजबूरियां बताई जा रही हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, जिसका असर अमेरिका में ईंधन और महंगाई पर पड़ा है। चुनावी माहौल में बढ़ती आर्थिक परेशानी ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है। वहीं, अमेरिकी जनता के बीच युद्ध को लेकर समर्थन भी कमजोर है। ऐसे में ट्रंप ईरान के सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाने को उपलब्धि के तौर पर पेश कर होर्मुज को खुलवाकर संघर्ष से बाहर निकलने की कोशिश कर सकते हैं।
ईरान क्यों मान रहा है अपनी जीत?
ईरान को भरोसा है कि लंबा खिंचता संघर्ष अमेरिका पर भारी पड़ रहा है और समय उसके पक्ष में जा रहा है। मिसाइल इंटरसेप्टर जैसे हथियारों के घटते भंडार, बढ़ती ईंधन कीमतों और अमेरिकी जनता के असंतोष से ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ रहा है। वहीं, यमन में ईरान समर्थित हूती समूहों की गतिविधियों से लाल सागर के व्यापारिक मार्ग पर भी असर पड़ रहा है। ऐसे में अगर अमेरिका संघर्ष से पीछे हटता है, तो तेहरान इसे अपनी रणनीतिक जीत और ट्रंप की बड़ी राजनीतिक हार के तौर पर पेश कर सकता है।
कहां उलझा है मामला?
ईरान की नई शर्तों ने संघर्ष खत्म करने की राह और मुश्किल कर दी है। तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बहाल करने के बदले अरबों डॉलर के भुगतान की मांग की है। साथ ही वह क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और नौसैनिक नाकेबंदी पूरी तरह हटाने पर भी जोर दे रहा है। इन मांगों को स्वीकार करना ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती बन सकता है।

