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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला-गृहणियां होममेकर नहीं नेशन बिल्डर

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि परिवार में पत्नियों का योगदान बहुत अहम होता है। इस वजह से उनके लिए “होममेकर्स” के बजाय नेशन बिल्डर शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने घरेलू इनकम के नुकसान के लिए अहम निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने कहा कि घरेलू देखभाल के नुकसान को मोटर एक्सिडेंट क्लेम में मुआवजा देने के लिए एक अतिरिक्त आधार माना जाएगा। कोर्ट के इस फैसले से होममेकर्स की मौत पर मुआवजे को कंट्रोल करने वाले पहले के उदाहरणों में पहले से तय सिद्धांतों को सपोर्ट मिलेगा।

कोर्ट ने कहा कि घर में काम करने वाली महिलाएं किसी ऐसे व्यक्ति से कम नहीं हैं, जो ऑफिस जाता है और घर चलाने के लिए पैसा कमाकर लाता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि एक गृहिणी का योगदान बेहद अहम होता है। उनके योगदान को आर्थिक रूप से आंकना मुश्किल है।

कैसे आंकी जाएगी गृहणियों की आय
कोर्ट ने कहा कि सड़क हादसों के मामले में गृहणियों की काल्पनिक आय का आंकलन उनके काम, श्रण और बलिदान के आधार पर किया जाना चाहिए। पीठ ने अपने आदेश में कहा, “एक गृहिणी की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि परिवार के किसी ऐसे सदस्य की जिसकी आमदनी स्थिर हो। यदि एक गृहिणी द्वारा किए गए कार्यों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसका योगदान उच्च कोटि का और अमूल्य है। वास्तव में, उसके योगदान का मूल्यांकन केवल मौद्रिक रूप से करना कठिन है।”

20 साल पुराने मामले की सुनवाई कर रहा था सुप्रीम कोर्ट
साल 2006 में उत्तराखंड में एक सड़क हादसे में महिला की मौत हो गई थी। वाहन का बीमा नहीं था। ऐसे में मालिक ने मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया। महिला के पति और नाबालिग बेटे की मौत के बाद मुआवजा 2.50 लाख रुपये तय किया गया। परिवार ने ज्यादा मुआवजे की अपील दायर की, लेकिन 2017 में इसे खारिज कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने कहा कि गृहिणी के मामले में मुआवजा जीवन प्रत्याशा और न्यूनतम काल्पनिक आय के आधार पर किया जाना चाहिए। न्यायाधिकरण ने महिला की काल्पनिक आय दिहाड़ी मजदूर से भी कम आंकी थी। हाई कोर्ट ने भी इसे सही करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी की आय को दिहाड़ी मजदूर से कम कैसे आंका जा सकता है। दो जज की बेंच ने कहा कि इस आंकलन को स्वीकार नहीं किया जा सकता। बेंच ने घर के काम में लगने वाले समय और मेहनत पर प्रयास डाला। इस दौरान कई तथ्यात्मक गलतियों की भी आलोचना की गई। रिपोर्ट में वाहन का प्रकार गलत लिखा गया था। महिला की उम्र कम बताई गई थी। वहीं, नाबालिग बेटे को वयस्क बता दिया गया था। पीठ ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दी और मृतक महिला के परिवार को छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।

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