सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज (बुधवार को) अहम फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ याचिकाओं के एक बैच पर ये फैसला सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने ये तय किया कि क्या चुनाव आयोग के पास मौजूदा रूप में SIR करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत शक्तियां हैं।
वोटर लिस्ट अपडेट करना स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कहना गलत है कि SIR कराकर चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया है। मतदाता सूची को अपडेट करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का हिस्सा है। ये आयोग का संवैधानिक दायित्व है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर SIR की कार्रवाई को कानून के खिलाफ नहीं कहा जा सकता कि इसकी प्रक्रिया सामान्य वोटर वेरिफिकेशन प्रक्रिया से भिन्न है।
29 जनवरी को सुरक्षित रखा गया था फैसला
लाइन लॉ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट की तरफ से SIR प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई गई है और यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है। यूपी, गुजरात और राजस्थान जैसे कई राज्यों में ये अभी जारी है।
याचिकाकर्ताओं में अलग-अलग पार्टियों के सांसद शामिल
इनमें से ज्यादातर याचिकाएं जून, 2025 में चुनाव आयोग की तरफ से बिहार में SIR करने के फैसले के बाद दाखिल की गई थीं। इनमें द एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, आरजेडी सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल, एनसीपी एसपी सांसद सुप्रिया सुले और अन्य याचिकाकर्ताओं का नाम शामिल है।

