Republic Day Chief Guest

Republic day 2026: गणतंत्र दिवस पर Chief Guest की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई, यहां जानिए कौन थे पहले विदेशी अतिथि?

Republic day 2026: हर साल 26 जनवरी की परेड में हर साल एक खास विदेशी मेहमान का चेहरा देश और दुनिया का ध्यान खींच लेता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कोई विदेशी नेता अपने देश की परेड का हिस्सा क्यों बनता है और भारत उसे यह सम्मान क्यों देता है? गणतंत्र दिवस का चीफ गेस्ट सिर्फ औपचारिक मेहमान नहीं होता, बल्कि भारत की विदेश नीति, रणनीति और भविष्य के रिश्तों का संकेत भी होता है. इस परंपरा की जड़ें आजादी के शुरुआती दौर तक जाती हैं. चलिए जानें.

गणतंत्र दिवस और चीफ गेस्ट की परंपरा

भारत में गणतंत्र दिवस मनाने की शुरुआत 26 जनवरी 1950 से हुई, जब देश में संविधान लागू हुआ. उसी साल से एक खास परंपरा भी शुरू हुई कि गणतंत्र दिवस पर किसी विदेशी मेहमान को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना. इसका मकसद था कि भारत दुनिया को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग का संदेश दे सके.

पहले विदेशी चीफ गेस्ट कौन थे?

भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था. उस समय परेड दिल्ली के इर्विन स्टेडियम में हुई थी, जिसे आज दादा ध्यानचंद स्टेडियम के नाम से जाना जाता है. यह न्योता एशिया के नवस्वतंत्र देशों के बीच दोस्ती और एकजुटता का प्रतीक माना गया.

किस साल नहीं आया कोई चीफ गेस्ट?

1952 और 1953 में गणतंत्र दिवस समारोह में कोई विदेशी मुख्य अतिथि नहीं था. उस दौर में भारत अपनी आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से जूझ रहा था. इसके बाद 1955 से परेड को राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, पर स्थायी रूप से आयोजित किया जाने लगा और उसी साल पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर-जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को मुख्य अतिथि बनाया गया.

चीफ गेस्ट कैसे चुना जाता है?

गणतंत्र दिवस के चीफ गेस्ट का चयन एक लंबी और सोच-समझकर की जाने वाली प्रक्रिया होती है. इसकी तैयारी आमतौर पर कार्यक्रम से करीब छह महीने पहले शुरू हो जाती है. विदेश मंत्रालय इस पूरी प्रक्रिया को संभालता है. इसमें देखा जाता है कि संबंधित देश या संगठन के साथ भारत के राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक रिश्ते कैसे हैं.

रिश्तों और रणनीति का संकेत

पूर्व राजनयिकों के अनुसार, चीफ गेस्ट का चयन सिर्फ सम्मान देने के लिए नहीं होता, बल्कि यह एक रणनीतिक संदेश भी होता है. इससे यह दिखाया जाता है कि भारत किन देशों या समूहों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है. कई बार यह रक्षा सहयोग, व्यापार समझौते या वैश्विक मुद्दों पर साझेदारी का संकेत देता है.

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