बिहार में शराबबंदी अब केवल एक सामाजिक नीति नहीं रह गई है। यह राजनीतिक विरासत, प्रशासनिक चुनौती, राजस्व का सवाल और सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा—चारों बन चुकी है। 9 अगस्त के हिन्दुस्तान में प्रकाशित रिपोर्ट में NCAER के अध्ययन के हवाले से शराबबंदी की उपयोगिता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ अपराध कम करने के अपने घोषित उद्देश्य में सफल नहीं दिखती और इसके साथ अवैध शराब तथा दूसरे नशों की ओर झुकाव बढ़ा है।
सवाल शराब पीने की आजादी का नहीं, नीति के परिणाम का है
शराबबंदी लागू करते समय सरकार का तर्क था कि शराब परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब करती है, घरेलू हिंसा बढ़ाती है और सामाजिक अपराधों को बढ़ावा देती है। इसलिए शराब की उपलब्धता रोकने से परिवार मजबूत होंगे और महिलाओं को सुरक्षा मिलेगी।
इस उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।
लेकिन किसी नीति का मूल्यांकन उसके उद्देश्य से नहीं, उसके परिणाम से होता है।
यदि शराब की दुकानें बंद हैं, लेकिन शराब की तस्करी जारी है; यदि शराब की जगह युवा दूसरे नशीले पदार्थों की ओर जा रहे हैं; यदि पुलिस और प्रशासन का बड़ा हिस्सा शराबबंदी लागू कराने में लगा है और फिर भी अवैध कारोबार समाप्त नहीं हुआ है, तो सरकार को कम-से-कम यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या मौजूदा मॉडल प्रभावी है?
यह सवाल इसलिए और गंभीर है क्योंकि मई 2026 में DRI ने बिहार में 104.9 किलो गांजा पकड़ा था। DRI के अनुसार पिछले एक वर्ष में बिहार में उसकी कार्रवाई में 1,277.81 किलो गांजा, 107.5 किलो चरस, 18.92 किलो हाइड्रोपोनिक वीड, 6 किलो कोकीन, 112.8 ग्राम हेरोइन और 8,012 बोतल अवैध रूप से डायवर्ट किए गए कोडीन वाले कफ सिरप जब्त हुए।
इससे यह साबित नहीं होता कि इन सभी नशीले पदार्थों की वृद्धि शराबबंदी के कारण ही हुई है—यह निष्कर्ष निकालना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह जरूर बताता है कि बिहार के सामने अब शराब के साथ-साथ ड्रग्स की एक अलग और गंभीर चुनौती खड़ी है।
सबसे बड़ा सवाल महिलाओं की सुरक्षा का
शराबबंदी का सबसे मजबूत राजनीतिक तर्क यही रहा है कि इससे महिलाओं के जीवन में सुधार हुआ है।
लेकिन यदि NCAER का अध्ययन यह कह रहा है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं आई, तो सरकार को इस दावे का तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।
यहां बहस को दो अतियों से बचाना जरूरी है।
यह कहना गलत होगा कि शराबबंदी से कोई फायदा ही नहीं हुआ।
लेकिन यह कहना भी पर्याप्त नहीं है कि शराबबंदी से महिलाओं को लाभ हुआ, इसलिए बाकी सभी सवाल अप्रासंगिक हैं।
सही सवाल है—
क्या वही सामाजिक लाभ कम प्रशासनिक लागत और कम अवैध कारोबार के साथ हासिल किया जा सकता है?
राजस्व का नुकसान बनाम सामाजिक लाभ
बिहार जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए राजस्व का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
2026-27 में बिहार का कुल राज्य का अपना कर राजस्व लगभग 65,800 करोड़ रुपये अनुमानित है। राज्य का विकास खर्च, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे की जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं।
ऐसे में शराबबंदी से होने वाले संभावित राजस्व नुकसान को हमेशा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन केवल राजस्व के लिए शराब खोल देना भी समाधान नहीं है।
सरकार को यह देखना होगा कि शराब से मिलने वाले टैक्स से ज्यादा बड़ा सामाजिक नुकसान तो नहीं होगा।
इसलिए बहस का सही विकल्प “शराबबंदी बनाम शराब की खुली बिक्री” नहीं, बल्कि “पूर्ण प्रतिबंध बनाम नियंत्रित, विनियमित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार नीति” होना चाहिए।
क्या बिहार को नीति की समीक्षा करनी चाहिए?
मेरे विचार से हां—लेकिन जल्दबाजी में पूर्ण शराबबंदी खत्म करने या बनाए रखने का फैसला नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और पारदर्शी नीति समीक्षा जरूरी है।
सरकार को पांच सवालों के जवाब सार्वजनिक करने चाहिए—
- शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में वास्तव में कितनी कमी आई?
- शराब से संबंधित अपराधों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों का आंकड़ा 2016 से अब तक क्या कहता है?
- शराबबंदी लागू करने पर पुलिस, न्यायपालिका और प्रशासन पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ा?
- अवैध शराब और ड्रग्स के कारोबार का वास्तविक आकार कितना बढ़ा?
- अगर शराबबंदी में बदलाव किया जाए तो क्या कड़ी लाइसेंसिंग, सीमित बिक्री, ऊंचा टैक्स, डिजिटल निगरानी और नशामुक्ति कार्यक्रम के साथ बेहतर मॉडल बनाया जा सकता है?
असली खतरा शराब नहीं, नशे का बदलता स्वरूप है
बिहार के लिए सबसे चिंताजनक बात यह होगी कि शराब के खिलाफ लड़ाई कहीं ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई में बदल जाए और सरकार को इसका एहसास देर से हो।
जुलाई 2026 में बिहार विधान परिषद में भी सूखे नशे के बढ़ते कारोबार पर पक्ष और विपक्ष दोनों ने चिंता जताई थी। नेपाल सीमा से जुड़े जिलों में तस्करी और बिना पर्ची नशीली दवाओं की बिक्री को लेकर भी सवाल उठे।
इसलिए अब सरकार को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कितनी शराब पकड़ी गई, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि बिहार का युवा किस नशे की तरफ जा रहा है।
निष्कर्ष
शराबबंदी को हटाना या बनाए रखना केवल राजनीतिक फैसला नहीं होना चाहिए। दस साल के अनुभव का वैज्ञानिक और निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए।
अगर शराबबंदी ने परिवारों को बचाया है तो सरकार को उसके प्रमाण सामने रखने चाहिए। अगर उसने महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाई है तो आंकड़े सामने आने चाहिए। और अगर उसके कारण अवैध शराब, भ्रष्टाचार, तस्करी और दूसरे नशों की समस्या बढ़ी है तो उस पर भी सरकार को ईमानदारी से विचार करना चाहिए।
नीति किसी नेता की प्रतिष्ठा से बड़ी होती है।
बिहार को अब यह तय करना है कि वह शराबबंदी को राजनीतिक प्रतीक बनाए रखेगा या उसे सामाजिक परिणामों के आधार पर पुनर्गठित करेगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “बिहार में शराब बिकनी चाहिए या नहीं?”
असल सवाल है—
“बिहार के नागरिकों को नशामुक्त, सुरक्षित और स्वस्थ समाज देने के लिए सबसे प्रभावी नीति कौन-सी है?”
और इस सवाल का जवाब भावना से नहीं, आंकड़ों और जमीन की सच्चाई से देना होगा।

