आधी आबादी के लिए पार्टियों का गेम प्लान कितना गंभीर? जानें महिलाओं के लिए क्या सोचते हैं दल

Up election and women: जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी…ये महज चुनावी नारा ही लगता है. क्योंकि यूपी में आठ करोड़ चार लाख पुरुष मतदाताओं के मुकाबले 6 करोड़ 98 लाख महिला मतदाता हैं. लोकतंत्र के उत्सव में वे बढ़ चढ़ कर हिस्सा भी लेती हैं लेकिन सियासी दल उन्हें सिर्फ वोटर की तरह ही ट्रीट करते हैं, उन्हें उनका हक नहीं देते हैं. चुनाव आते ही सारे दलों का फोकस महिला वोटर्स (women voters) पर होता है. बड़े से बड़े नेता घर घर जाकर महिलाओं के सामने हाथ जोड़कर वोट मांगते नजर आते हैं… मगर कई राजनीतिक दलों के लिए महिलाओं के वोट पाने का महज ये चुनावी शिगूफा भर है.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) ने लड़की हूं, लड़ सकती हूं नारे के साथ कोशिश की थी कि आधी आबादी को राजनीति में सीधे तौर पर भागीदारी दिलाने की मगर कांग्रेस के पास जमीन पर कैडर की गैरमौजूदगी और जिताऊ प्रत्याशी ना होने की वजह से ये सम्भव नहीं हो सका. मुख्य विपक्षी पार्टी सपा में तो महिलाओं की भागीदारी ना के बराबर है. अखिलेश यादव ने पूरे चुनाव के दौरान 43 रोड शो किए मगर पूरे रोड शो में महिलाएं कहीं नहीं थीं जबकि भाजपा और कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं के रोड शो में भारी तादाद में महिलाएं शामिल होती हैं.

भाजपा के केंद्र में महिला मतदाता
भाजपा ने चुनावी रणनीति तैयार करते वक्त खासतौर से आधी आबादी पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. शौचालय, उज्जवला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, फ्री राशन और कानून व्यवस्था का मुद्दा इस पूरे चुनाव प्रचार में हावी रहा. योगी आदित्यनाथ मंचों से खुलकर बोलते रहे हैं कि गुंडे माफिया जेल जांएगे तो इसका सीधा असर महिला वोटर के सम्मान से जुड़ा हुआ है. छ चरण का मतदान हो चुका है और महिला वोटर जिस तरह घर से निकल कर वोट कर रही हैं वो अप्रत्याशित है. पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार के विधानसभा चुनाव में महिलाओं का वोट चार प्रतिशत बढ़ा है. प्रधानमंत्री मोदी ने 21 दिसंबर को स्वंय सहायता समूहों के बैंक खातों में एक हजार करोड़ रुपए ट्रांसफर किए थे जिससे सीधे तौर पर 16 लाख महिलाओं को लाभ मिला है. भाजपा ने इसी आधी आबादी को ध्यान में रखकर कमल किटी क्लब बनाया था जो टोलियों में जनसम्पर्क करती थी और महिला वोटरों पर ही फोकस करती थीं.

सपा ने 7 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया
वहीं सपा की महिलाओं को लेकर कोई रणनीति नहीं रही. यहां तक की टिकट बंटवारे में भी महिलाओं की भागीदारी ना के बराबर है, सिर्फ सात प्रतिशत महिलाओं को ही सपा ने टिकट दिया है. अखिलेश यादव ने एम-वाई समीकरण को नया लुक देने की कोशिश करते हुए बोला कि नई सपा में एम-वाई का मतलब महिला और युवा हैं. हालांकि धरातल पर ये बयान पूरा हवा हवाई साबित हो रहा है. बहुजन समाज पार्टी की नेता खुद महिला हैं मगर उन्होने ना कभी महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए कुछ खास किया और ना ही महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे. उनका ज्यादा फोकस जातियों की सोशल इंजीनियरिंग पर रहता है.

अखिलेश यादव के रोड शो में महिलाएं नदारद
धर्म नगरी काशी में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली में शामिल रही छात्र मोनिका बताती है कि भाजपा के लोग अनुशासित तरीके से रोड शो में शामिल थे, वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव के रोड शो में महिलाएं थी ही नहीं क्योंकि महिलाओं के साथ कई सारी घटनाएं हो चुकी हैं. इसीलिए जो लोकल महिला नेता भी होती हैं वो भी हिम्मत नहीं कर पाती इस तरह के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने की. आपको बता दें कि पिछले चुनाव में 40 महिलाएं विधायक बनी थीं जो कि अभी तक का बेहतरीन रिकॉर्ड रहा है, यूपी में कुल 403 विधानसभा सीट है.

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