नवाज़ुद्दीन या कमल हासन नहीं! इस खतरनाक विलेन ने रचा इतिहास—बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड जीतकर सबको किया हैरान

भारतीय सिनेमा में कई अभिनेत्रियों ने अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान जीतकर देश का गौरव बढ़ाया है। हालांकि, इस सूची में एक अनोखा नाम भी शामिल है – एक पुरुष अभिनेता , जिन्होने किन्नर का किरदार इतनी बेहतरीन तरीके से निभाया कि उन्हें ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिल गया। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शानदार अदाकारी और यह यादगार भूमिका आज भी फिल्म इंडस्ट्री में मिसाल मानी जाती है।

एक अनोखा अंतरराष्ट्रीय सम्मान
भारतीय फिल्मों में कमल हसन (चाची 420,) गोविंदा ( आंटी नम्बर 1) से लेकर नवाजुद्दीन सिद्दकी और अक्षय कुमार तक कई सितारों ने कॉर्स-ड्रेसर या ट्रांसजेंडर किरदार निभाए, लेकिन जो मुकाम निर्बल पांडे ने हासिल किया , वह आज भी अनोखा है। अपने करियर की शुरूआत में उन्होंने अमोल पालेकर की फिल्म दायरा में ट्रांसजेंडर का दामदर किरादार निभाया। इस भूमिका के लिए 1997 में वायलेंस फिल्म फेस्टिवल में उन्हें सह-कलाकार सोनाली कुलकर्णी के साथ संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवॉर्ड मिला। यह किसी भारतीय पुरुष अभिनेता के नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज पहली और अनोखी उपलब्धि है, जिसे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी शामिल किया गया है।

भारत में क्यों नहीं रिलीज हो पाई ‘दायरा’?
हैरानी की बात है कि दायरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहना मिली, लेकिन यह भारत के सिनेमाघरों तक कभी नहीं पहुंच सकी। अमोल पालेकर के निर्देशन में बनी इस फिल्म की कहानी महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आधारित थी, जिसे लेकर सेंसर बोर्ड ने कुछ दृश्यों और संवादों पर आपत्ति जताई। काफी संघर्ष के बाद फिल्म को 1996 में ‘ए’ सर्टिफिकेट तो मिला, लेकिन विवादों और वितरकों की कमी के चलते यह थिएटर में रिलीज नहीं हो पाई। बाद में इसे भारत में सीधे डीवीडी पर जारी किया गया।

एक बहुमुखी अभिनेता का सफर
1962 में जन्मे निर्मल पांडे ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय की पढ़ाई की और बाद में लन्दन में थिएटर से जुड़कर अपने हुनर को निखारा। भारत लौटना पर उन्होंने शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन से डेब्यू किया। अपने करियर में उन्होंने प्यार क्या तो डरना क्या और वन 2 का 4 जैसी फिल्मों में विलेन के दमदार रोल निभाए, वहीं हद कर दी आपने में कॉमेडी से भी दर्शकों का दिल जीता। दुर्भाग्यवश 2010 मे 47 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फिल्म लाहौर थी, जो उनके जाने के बाद रिलीज हुई। आज भी उनका नाम भारतीय सिनेमा की उन यादगार उपलब्धियो में शामिल है, जिसने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया।

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