गंगा में बहती लाशें एक बड़े रंगमंच का हिस्सा हैं, जहां हर कोई अपने तय डायलॉग बोल रहा है

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गंगा में तैरती लाशें यदि आपको विचलित कर रही हैं तो गंगा पथ के ग्रामीणों की अज्ञानता पर चच्च्च्च् करने के बजाए तथ्यों पर एक नज़र डालिए, आपको प्रशासनिक-सामाजिक–धार्मिक बाजार का वीभत्स चेहरा नज़र आएगा, ये चेहरा फूल कर विजुअल बन गया हैं और टीवी स्क्रीनों पर तैर रहा है.

भोलेपन की पराकाष्ठा के साथ पहला डायलॉग जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने ट्वीट किया, जिसमें उन्होने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए मोदी सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई.

अपने बॉस के विचार का संदर्भ लेकर नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीसी) के प्रमुख राजीव रंजन मिश्र ने गंगा पथ के सभी जिला कलेक्टरों को पत्र लिख दिया कि डीएम पक्का करें कि गंगा में लाशें ना फेंकी जाएं.

फिर पीटीआई और एएनआई ने उन्नाव में लाशें दफनाने की एक खबर यूं प्रकाशित की मानों ब्रेकिंग न्यूज हो. इस खबर पर उन्नाव के अधिकारियों ने भी ‘स्क्रिप्टेड बयान’ दिया.

गंगा में फेंकी ज्यादातर लाशें ‘प्रशासन द्वारा’ डाली गई है, यह बात केंद्रीय मंत्री या उनके मातहत को नहीं पता, इस पर भरोसा करना थोड़ा कठिन है. बह रहे ज्यादातर शवों पर कोई कफन नहीं है, यदि गांव के लोग बड़ी संख्या में भी शव का जलप्रवाह कर रहे हैं तो भी बहाने से पूर्व संस्कार होता है और कफन पहनाया जाता है.

वास्तव में अस्पताल में कोविड से होने वाली मौतों के अंतिम संस्कार का जिम्मा पुलिस का है, शव परिवार को नहीं सौंपा जाता उन्हें सिर्फ चेहरा दिखाया जाता है और कई बार तो चेहरा भी नहीं दिखाया जाता सिर्फ सूचना दी जाती है.

स्थानीय पुलिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए जिन एंबुलेंस वालों की सेवाएं लेती है, उन्हें इस काम की तय रकम मिलती है. तय रकम में पूरी क्रिया करने के बजाए उसे नदी में बहा देना ज्यादा आसान काम है. यूपी और बिहार में गंगा में जलप्रवाह की गई लाशें ‘अस्पतालों से सीधे लाई’ गई थी.

गंगा में लाशें बहने का दूसरा बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय शहर बनारस है. दो प्राचीन शवदाह घाट मणिकर्णिका और हरीशचंद्र घाट पर अत्यधिक भीड़ है. मणिकर्णिका घाट में लाशें जलने के विजुअल अंतरराष्ट्रीय मीडिया के ‘पसंदीदा’ विजुअल हैं.

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शवदाह की भीड़ बनारस के स्थानीय लोगों की ही है, शहर के आसपास वाले इलाके शव लेकर बनारस नहीं पहुंच रहे, एक तो उनके भीतर डर समाया हुआ है दूसरा पुलिस प्रशासन भी अंतिम संस्कार के लिए वाराणसी जाने से रोक रहा है ताकि स्थिती हाथ से ना निकले.

शहर में शव लेकर घुसने पर लगी रोक का नतीजा यह हुआ कि जो सक्षम था वह मिर्जापुर या मुगलसराय या गाजीपुर चला गया. जो सक्षम नहीं था उसने शहर के बाहर ही गंगा किनारे अंतिम संस्कार करने की कोशिश की, अब हर जगह तो चिता के लिए लकड़ियां मिलती नहीं तो मछुआरे को पैसा देकर शवों को गंगा में बहा दिया गया.

एनएमसीसी ने गंगापथ पर कई जगह क्रिमेशन सेंटर बनाए हैं. कोविड से बिगड़ती स्थिती में अंतिम संस्कार की लागत चार गुना तक बढ़ गई है. लकड़ियां या तो उपलब्ध नहीं है और जो है वह मनमांगी कीमत पर मिलती है. गांव वाले तो अपने स्थानीय घाट पर सुविधाएं ना होने के कारण सामूहिक तौर पर शव के साथ ही लकड़ियां और उपले ले आते हैं लेकिन छोटे शहरों में घाट के पास मौजूद बांस घाट से लकड़ियां खरीदनी होती हैं. (ज्यादातर अंतिम संस्कार घाट को गंगा पथ पर बांस घाट कहा जाता है, क्योंकि यहां बांस की बनी अर्थी और अन्य सामान मिलता है.)

इलाज के साथ शुरू हुई मुनाफाखोरी मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती और मजूबर लोग शव को गंगा में बहा देते हैं. गंगा में बहाने पर भी पैसा खर्च होता है क्योंकि नाविक इस गैरकानूनी काम के लिए पैसा लेता है और यह भरोसा देता है कि वह बीच धारा में जाकर बहा देगा.

मानसून के ठीक पहले हवाएं उत्तर–पूर्व से दक्षिण–पश्चिम की ओर बहती हैं. डाउनस्ट्रीम में काशी से सटे इलाकों में हर साल मानसून के ठीक पहले लोग यह सोच कर शव को गंगा में बहा देते हैं ताकि वह उल्टी हवा के सहारे काशी पहुंच जाए और उसे बैकुंठ हासिल हों लेकिन अब गंगा की धारा में पानी ही नहीं बचा तो अकेली हवा क्या कर लेगी. यही कारण है कि लाशें बहने की ज्यादातर घटनाएं वाराणसी के करीब के गाजीपुर, बलिया और बक्सर क्षेत्र की हैं.

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एक परंपरा और है- खास तौर पर गाजीपुर क्षेत्र में की कुंआरों के शव को जलाया नहीं जाता, उन्हे गंगा में बहा दिया जाता है.

काल का एक ओर चेहरा देखिए– सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का संस्मरणात्मक उपन्यास ‘कुल्ली भाट ’ अब से करीब अस्सी साल पहले प्रकाशित हुआ था. जिसमें उन्होने 1918 में आए स्पेनिश फ्लू का जिक्र करते हुए लाशों को गंगा में बहाने और रेत में दफनाने का जिक्र किया है.

कथा का केंद्र बिंदु उन्नाव था. वहीं उन्नाव जहां पीटीआई को बड़ी संख्या में दफन की हुई लाशें दिखीं. दरअसल गंगापथ पर उन्नाव से लेकर वाराणसी के ठीक पहले तक गंगा किनारे पिछले कई दशकों से हिंदुओं के शव दफनाएं जा रहे हैं. कारण एक ही है– गरीबी.

जंगल बचे नहीं तो जलाने की लकड़ी मंहगी पड़ती है. लोग यह सोच कर गंगा की रेत में शव गाड़ देते है कि जब बाढ़ आएगी तो गंगा उसके आत्मीय को भी तार देंगी और साथ में बैकुंठ ले जाएंगी. संस्कार की इस विधि के तहत गाड़ने के बाद बेसन का एक पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है. इलाहाबाद के झूंसी और श्रृंगवेरपुर इलाके शवों को दफनाने के गढ़ हैं.

लेकिन पिछले कुछ सालों से तस्वीर भयावह होती जा रही है. रेत में गड्डा करने का खर्च करीब पांच सौ रुपए बैठता है, थोड़ा गड्ढा खोदने के बाद पता चलता है कि वहां पहले से ही एक लाश गड़ी है, अब गरीब आदमी के पास पैसा नहीं कि वह दोबारा गड्ढा करवाने का पैसा दे, तो लाश के ऊपर ही लाश को दफन कर दिया जाता है. पुलिस प्रशासन इन तथ्यों से अच्छी तरह परिचित हैं. ‘दर दर गंगे ‘ किताब में लाश दफनाने पर पूरी एक कहानी दर्ज है.

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इस तस्वीर को थोड़ा समझिए– वाराणसी के डाउनस्ट्रीम में शव बहाए जाते हैं वह भी मानसून के ठीक पहले और वाराणसी के अपस्ट्रीम में (उन्नाव से लेकर वाराणसी के ठीक पहले तक) शवों को दफना दिया जाता है ताकि बाढ़ आने पर वे काशी पहुंच जाए. सभी मान्यताओं की जड़ में किसी ना किसी तरह काशी पहुंचना शामिल है.

जहां–जहां जलाकर अंतिम संस्कार किया जाता है वहां भी आदमी के सीने का हिस्सा और औरत के कूल्हे का हिस्सा बचा लिया जाता है और उसे गंगा में प्रवाहित कर देते हैं. प्रयागराज से डाउनस्ट्रीम गंगा का पाट चौड़ा होने लगता है और यह अधजली लाशें किनारे लग जाती हैं.

इन तथ्यों के आड़ में उन्नाव के डीएम का बयान कि ‘हम जांच करेंगे’, एक तरह से उस महत्वपूर्ण घटना से लोगों का ध्यान बंटाने की कोशिश है जो एक दिन पहले ही उन्नाव में घटी. वहां सरकारी अस्पताल के कई डाक्टरों ने प्रशासन के लचर रवैये और कोविड मरीजों को इलाज ना दे पाने की अपनी लाचारी के चलते सामूहिक इस्तीफा दे दिया था. यह घटना राज्य सरकार की ‘अपने गाल बजाओं’ नीति पर कुठाराघात थी. लेकिन अखबार की सुर्खियां बनी दफन लाशों की खबर.

रंगमंच सजा हुआ है, किनारे पर कुछ विदुषक भी खड़े हैं, आईटी सेल ने उन्हे स्क्रिप्ट थमा दी है जिस पर लिखा है- सरकार को कोसने से क्या होगा जब समाज ही भ्रष्ट है, जो अपने सगे को गंगा में फेंक रहा है.

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