प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 के बाद से बंगाल, बिहार और ओडिशा समेत 9 राज्यों में पहली बार मुख्यमंत्री पद हासिल किया है। जानिए भाजपा के इस स्वर्णिम विस्तार और सुशासन मॉडल की पूरी कहानी।
भारतीय राजनीति के इतिहास में साल 2014 एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल केंद्र की सत्ता बदली, बल्कि राज्यों के राजनीतिक नक्शे को भी पूरी तरह से नई परिभाषा दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उन भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाई है, जहां कभी पार्टी का अस्तित्व नगण्य माना जाता था। हाल ही में पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने इस सफर को एक नई ऊंचाई दी है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के अभेद्य शासन को समाप्त कर भाजपा ने बंगाल की सत्ता हासिल की है। यह केवल एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि उस लंबी यात्रा का शिखर है, जिसमें भाजपा ने पिछले 12 वर्षों में नौ ऐसे राज्यों में अपना पहला मुख्यमंत्री बनाया है, जहां पहले कभी उसका नेतृत्व नहीं रहा था।
हरियाणा और महाराष्ट्र से हुई विजयी यात्रा की शुरुआत
भाजपा के इस स्वर्णिम काल की नींव 2014 में ही पड़ गई थी। हरियाणा, जिसे पारंपरिक रूप से लाल तिकड़ी और क्षेत्रीय क्षत्रपों का गढ़ माना जाता था, वहां भाजपा ने पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। मनोहर लाल खट्टर को राज्य की कमान सौंपी गई और यहां से भाजपा के एक नए राजनीतिक मॉडल की शुरुआत हुई।उसी साल महाराष्ट्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बाद भाजपा ने महायुति गठबंधन के साथ सरकार बनाई और देवेंद्र फडणवीस राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने। इन राज्यों की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया था कि प्रधानमंत्री मोदी का ‘सुशासन मॉडल’ हिंदी पट्टी के बाहर भी मतदाताओं को आकर्षित कर रहा है।
पूर्वोत्तर भारत में भगवा क्रांति और असम का उदय
साल 2016 भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ, जब पार्टी ने पूर्वोत्तर भारत के प्रवेश द्वार ‘असम’ में अपनी पहली सरकार बनाई। सर्बानंद सोनोवाल राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने। असम की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने पूरे पूर्वोत्तर में भाजपा के लिए रास्ते खोल दिए। तब से भाजपा असम में अपराजेय बनी हुई है और हालिया चुनावों सहित लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। पूर्वोत्तर में भाजपा की रणनीति केवल गठबंधन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया।
अरुणाचल और मणिपुर का राजनीतिक पुनर्गठन
असम के बाद अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने एक अलग रणनीति के तहत सत्ता हासिल की। 2016 में बड़े राजनीतिक उलटफेर के बीच पेमा खांडू ने कांग्रेस छोड़ी और अंततः अपने सहयोगियों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इससे राज्य में भाजपा की पहली स्थिर सरकार बनी। इसी तरह 2017 में मणिपुर में भी भाजपा ने क्षेत्रीय दलों जैसे नेशनल पीपुल्स पार्टी और नगा पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर सरकार बनाई। एन. बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया, जिन्होंने उग्रवाद प्रभावित इस राज्य में विकास और शांति को प्राथमिकता दी। इन राज्यों में भाजपा का मुख्यमंत्री बनना इस बात का प्रमाण था कि पार्टी अब केवल ‘हिंदी भाषी’ पार्टी नहीं रह गई थी।
त्रिपुरा में वामपंथ का और ओडिशा में नवीन युग का अंत
2018 में भाजपा ने त्रिपुरा में वह कर दिखाया जो राजनीतिक पंडितों के लिए असंभव था। दशकों पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकते हुए बिप्लव कुमार देव के नेतृत्व में पहली बार भाजपा की सरकार बनी। इसके बाद 2024 में पूर्वी भारत के एक और महत्वपूर्ण राज्य ओडिशा में भाजपा ने बीजद के 24 साल पुराने शासन को समाप्त किया। नवीन पटनायक जैसे कद्दावर नेता को हराकर मोहन चरण माझी राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने। ओडिशा की इस जीत ने यह सिद्ध कर दिया कि भाजपा अब क्षेत्रीय दिग्गजों के सामने न केवल चुनौती पेश कर रही है, बल्कि उन्हें सत्ता से बेदखल करने की क्षमता भी रखती है।
बिहार में दशकों का इंतजार और सम्राट चौधरी का नेतृत्व
बिहार की राजनीति में भाजपा हमेशा से एक प्रमुख खिलाड़ी रही है, लेकिन वह लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारों में कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका में रही। दो दशकों के इंतजार के बाद 2026 में वह क्षण आया जब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद भाजपा ने अपना पहला मुख्यमंत्री बनाया। सम्राट चौधरी के रूप में बिहार को भाजपा से पहला नेतृत्व मिला। यह भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए एक भावनात्मक और रणनीतिक जीत थी, क्योंकि बिहार जैसे राज्य में अपनी शर्तों पर सरकार चलाना हमेशा से पार्टी का लक्ष्य रहा था।
बंगाल फतह: बड़ी बाधाओं को पार कर बनी सरकार
पश्चिम बंगाल की जीत भाजपा की अब तक की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण जीत मानी जा रही है। 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर भाजपा ने उस राज्य में सरकार बनाई है, जो वैचारिक रूप से पार्टी के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण था। ममता बनर्जी के 15 साल के शासन को चुनौती देना और उसे हराना भाजपा के संगठन की मजबूती को दर्शाता है। राष्ट्रीय प्रवक्ताओं का मानना है कि अनुच्छेद 370 हटाना, सीएए लागू करना और राम मंदिर निर्माण जैसे वादों को पूरा करने की विश्वसनीयता ने बंगाल के मतदाताओं का भरोसा जीतने में मदद की।
सुशासन मॉडल और भविष्य की संभावनाएं
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला और तुहिन ए. सिन्हा के अनुसार, पार्टी का यह विस्तार प्रधानमंत्री मोदी की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति का परिणाम है।
आज भाजपा और राजग की सरकारें देश की लगभग 78 प्रतिशत आबादी और 72 प्रतिशत भूभाग पर शासन कर रही हैं। पूर्वोत्तर में जो उपेक्षा कांग्रेस के समय में थी, उसे दूर कर भाजपा ने क्षेत्रीय असंतुलन को समाप्त किया है। अब भाजपा की नजरें उन अंतिम मोर्चों पर हैं जहां उसकी उपस्थिति अभी भी सीमित है। तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्य अब पार्टी की भविष्य की विस्तार योजनाओं के केंद्र में हैं। रोचक बात है कि प्रधानमंत्री 10 मई को कर्नाटक दौरे पर गए और वहां उन्होंने अपने भाषण में इस बात का जिक्र किया कि तेलंगाना में भाजपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है और केरल में भी पार्टी धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।

