अयोध्या में शाम ढलते ही सरयू के घाटों पर रौनक बढ़ने लगती है। घाटों पर मिट्टी के दीये सजाए जाते हैं और उनमें तेल-बाती डालकर रोशनी की तैयारी की जाती है। मंदिरों की घंटियों, शंखनाद और श्रद्धालुओं की चहल-पहल के बीच जैसे ही दीये जलते हैं, पूरा घाट सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता है। सरयू के पानी में दीयों की चमक बेहद खूबसूरत नजारा पेश करती है। अयोध्या में दीप जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि भगवान राम के वनवास से लौटने की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। हालांकि, पिछले 10 वर्षों में दीपोत्सव ने एक नया स्वरूप हासिल किया है। अब यह पर्व घरों और मंदिरों तक सीमित न रहकर पूरे शहर की पहचान और सामूहिक उत्सव का प्रतीक बन गया है।
2017 में पहली बार जब राम की पैड़ी पर सजे लाखों दीये
18 अक्टूबर 2017 की शाम अयोध्या के इतिहास में एक खास याद बन गई। इस दिन राम की पैड़ी पर करीब 1.71 लाख मिट्टी के दीये जलाए गए, जिसके साथ दीपोत्सव को पहली बार भव्य सार्वजनिक आयोजन के रूप में पेश किया गया। सरयू के किनारे जगमगाते दीयों, रामायण पर आधारित झांकियों, नृत्य-संगीत और शोभायात्राओं ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। इस आयोजन के जरिए भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या लौटने की स्मृति को एक नए और भव्य स्वरूप में जीवंत किया गया।
एक-एक साल के साथ बढ़ती गई रोशनी, बदलता गया उत्सव
अयोध्या दीपोत्सव में हर साल दीयों की संख्या के साथ आयोजन की भव्यता भी बढ़ती गई। 2017 में जहां 1.71 लाख दीये जलाए गए थे, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 3.01 लाख और 2021 में 9.41 लाख तक पहुंच गया। इसके बाद 2022 में 15.76 लाख और 2023 में 22.23 लाख दीयों से घाट रोशन हुए। साल 2024 में 25,12,585 और 2025 में 26,17,215 दीये जलाकर नए रिकॉर्ड बनाए गए। अब 2026 में 30 से 33 लाख दीये जलाने की तैयारी है। यानी पहले दीपोत्सव के मुकाबले इस बार दीयों की संख्या करीब 15 गुना तक बढ़ सकती है।
दीपोत्सव में सिर्फ दीये नहीं जलते, अयोध्या की लोक संस्कृति भी दिखती है
किसी शहर की असली पहचान उसके ऐतिहासिक स्थलों के साथ वहां की संस्कृति, परंपराओं और लोगों के हुनर से भी बनती है। अयोध्या का दीपोत्सव इसकी खूबसूरत मिसाल है। इस आयोजन में दीये बनाने वाले कुम्हारों से लेकर घाटों को सजाने वाले विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों तक, हर किसी की भागीदारी देखने को मिलती है। कुम्हारों के हाथों से बने मिट्टी के दीये न सिर्फ पारंपरिक शिल्प को बढ़ावा देते हैं, बल्कि दीपावली की पुरानी परंपरा को भी जीवंत रखते हैं। दीपोत्सव की भव्यता रामायण पर आधारित झांकियों, लोकनृत्य, संगीत और विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से और बढ़ जाती है। कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के जरिए रामकथा और भारतीय लोक संस्कृति की झलक पेश करते हैं। इस तरह अयोध्या का दीपोत्सव केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने का अवसर भी बन गया है।
राम मंदिर के बाद अयोध्या के दीपोत्सव का बदला संदर्भ
22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या की पहचान को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली। इसके साथ ही शहर में श्रद्धालुओं की आवाजाही और धार्मिक पर्यटन में भी नई दिलचस्पी देखने को मिली। ऐसे में दीपोत्सव का महत्व और बढ़ गया है। भगवान राम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ा यह पर्व अब राम मंदिर समेत शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाता है। हालांकि, अयोध्या की पहचान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहां के घाट, गलियां, लोकगीत, साधु-संतों की परंपराएं और सरयू आरती भी इसकी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं। दीपोत्सव इन सभी परंपराओं को एक मंच पर लाकर अयोध्या के अतीत और वर्तमान को जोड़ने का काम करता है।
अयोध्या दीपोत्सव 2026: दसवें साल में क्या होगा खास
साल 2026 में अयोध्या अपना दसवां दीपोत्सव मनाने की तैयारी में है। मुख्य आयोजन 7 नवंबर को प्रस्तावित है, जिसके तहत राम की पैड़ी और सरयू घाट पर करीब 30 से 33 लाख मिट्टी के दीये जलाने का लक्ष्य रखा गया है। इस बार उत्सव में 2,100 ड्रोन शो, सरयू आरती, रामायण पर आधारित झांकियां, लेजर शो और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र होंगे।
खास बात यह होगी कि इस बार पारंपरिक दीपों की रोशनी के साथ आधुनिक तकनीक का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। घाटों पर जगमगाते दीयों और आसमान में ड्रोन से बनने वाली रंग-बिरंगी आकृतियों के जरिए अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत को नए अंदाज में पेश किया जाएगा।

