बिहार चुनाव में ओवैसी ने अपनी पार्टी के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया। शहर, गांवों, नक्कड़ पर जनसभाएं कीं और एनडीए, राजद सहित महागठबंधन को अपने निशाने पर लिया। अपनी रैलियों ने उन्होंने सीमांचल के पिछड़ेपन, वहां की गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा को मुद्दा बनाया। ओवैसी ने बताया कि विकास के सभी मानकों पर सीमांचल पिछड़ा हुआ है।
AIMIM Bihar Election Result 2025: बिहार चुनाव में एनडीए की प्रचंड लहर ने महागठबंधन की ‘नाव’ तो डुबो दी लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के मुखिया अपनी कश्ती बचाने में कामयाब हो गए। सीमांचल की 24 सीटों में से पांच सीटों पर उनकी पार्टी विजयी हुई है। चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों का जहां भीषण हार का सामना करना पड़ा, वहीं एआईएमआईएम के लिए पांच सीटें जीतना ओवैसी के लिए बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। राजद बिहार में एक तरह से मुस्लिमों पर अपना हक समझती आई है, लेकिन सीमांचल में ओवैसी की जीत ने इस नरेटिव को तोड़ दिया है और सीमांचल के मुस्लिमों ने ओवैसी को अपने नेता के रूप में पेश किया है।
जाहिर है कि ओवैसी की इस जीत का कंपन बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश में अभी से महसूस किया जाने लगेगा, जहां आने वाले वर्षों में विधानसभा चुनाव हैं। इस जीत ने ओवैसी को बड़ी ताकत दी है, उन्होंने मुस्लिमों पर अपना हक जताने वाले अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को एक तरह से आगाह कर दिया है कि मुस्लिम समुदाय केवल उनका वोट बैंक नहीं है, बल्कि वह अपने हक, आजादी, न्याय और बराबरी के दर्ज के लिए चुनावों में वोट करेगा। ओवैसी अब अपने इस नरेटिव को लेकर आगे बढ़ेंगे।
सीमांचल में इन 5 सीटों पर जीती AIMIM
मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में खासा प्रभाव रखने वाली एआईएमआईएम ने 243 विधानसभा सीटों में से 29 पर चुनाव लड़ा। इनमें से 24 सीट सीमांचल क्षेत्र की हैं। एआईएमआईएम के अख्तरुल ईमान ने अमौर सीट पर 38,928 मतों से जीत दर्ज की। उन्हें 1,00,836 वोट मिले। मोहम्मद सरवर आलम ने कोचाधामन में 23,021 वोटों से जीत हासिल की, उन्हें कुल 81,860 वोट मिले। गुलाम सरवर ने बैसी सीट पर 27,251 वोटों से जीत हासिल की और उन्हें कुल 92,766 वोट मिले।

मोहम्मद मुर्शीद आलम ने जोकीहाट सीट पर 28,803 वोटों से जीत हासिल की और उन्हें कुल 83,737 वोट मिले। बहादुरगंज सीट से पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद तौसीफ आलम ने 28,726 वोटों से जीत हासिल की। उन्हें 87,315 वोट मिले।
एआईएमआईएम ने सत्तारूढ़ या विपक्षी गठबंधन में शामिल हुए बिना, स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा। खास बात यह है कि ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार पिछले विधानसभा चुनाव से ज्यादा वोटों के मार्जिन से चुनाव जीते। बिहार चुनाव में ओवैसी की पार्टी को 1.85 प्रतिशत वोट मिले हैं।
सीमांचल के मुस्लिमों ने राजद पर नहीं ओवैसी पर जताया भरोसा
बिहार चुनाव में ओवैसी ने अपनी पार्टी के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया। शहर, गांवों, नक्कड़ पर जनसभाएं कीं और एनडीए, राजद सहित महागठबंधन को अपने निशाने पर लिया।
अपनी रैलियों ने उन्होंने सीमांचल के पिछड़ेपन, वहां की गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा को मुद्दा बनाया। ओवैसी ने बताया कि विकास के सभी मानकों पर सीमांचल पिछड़ा हुआ है। आज तक इस इलाके के साथ इंसाफ नहीं हुआ है। मुस्लिमों का झंडाबरदार कहलाने वाली पार्टियां केवल उनका वोट हासिल करती रहीं लेकिन उनके हित में कोई काम नहीं किया। ओवैसी ये बातें समझाने और अपना नरेटिव सेट करने में कामयाब रहे। उन्होंने अपनी रैलियों में बार-बार कहा कि राजद या महागठबंधन एनडीए और भाजपा को जीत से नहीं रोक सकता। सीमांचल के मुस्लिमों को ओवैसी में अपना नेता नजर आया और उन पर भरोसा करते हुए उन्होंने एआईएमआईएम को अपना वोट दिया और इसका नतीजा जो हुआ, वह सभी के सामने है। अपनी इस जीत के बाद ओवैसी ने कहा कि बिहार में एसआईआर मुद्दा था ही नहीं। बिहार में कु-प्रशासन, गरीबी,बेरोजगारी, पलायन मुद्दे थे लेकिन महागठबंधन ने इस पर बात नहीं की।
अपने इस नरेटिव को लेकर यूपी और अन्य राज्यों में जाएंगे ओवैसी
बिहार में मिली इस कामयाबी को लेकर ओवैसी अन्य राज्यों में जाएंगे। उन्होंने संकेत दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में वह अपने पूरे दमखम के साथ उतरेंगे। उन्होंने अखिलेश यादव को चेता भी दिया है कि ‘एम-वाई’ समीकरण काम नहीं करने वाला है। टाइम्स नाउ नवभारत के साथ खास बातचीत में ओवैसी ने कहा कि मुस्लिमों को अपना वोट बैंक और ‘बंधुआ मजदूर’ समझने वाली समाजवादी पार्टी जैसे दल को यह समझने की जरूरत है कि मुस्लिम उनके गुलाम नहीं हैं जिन्हें डराकर उनका वोट लिया जाता रहेगा। वह समय चला गया जब मुस्लिम डरकर वोट देते थे। अब वे अपने हक, बराबरी और न्याय के लिए वोट करेंगे। ओवैसी ने कहा कि सपा, राजद जैसे दल ‘धर्मनिरपेक्षता’ को बचाने की दुहाई देकर मुस्लिमों से उनका वोट लेते आए हैं। ओवैसी ने पूछा कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ को बचाए रखने का ठेका क्या ‘मुस्लिमों’ ने ले रखा है। एआईएमआईएम नेता ने कहा कि अब यह चलने वाला नहीं है। वह 2027 में यूपी में पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ेंगे। इसके लिए उनकी पार्टी का पल्लवी पटेल, स्वामी प्रसाद मौर्य और चंद्रशेकर आजाद की पार्टी के साथ समझौता हो चुका है। केरल में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ओवैसी इस दक्षिण के राज्य में भी चुनाव लड़ सकते है।
यूपी में करीब 20% मुस्लिम मतदाता, 143 सीटों पर असर
उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं और सूबे की कुल 143 सीटों पर मुस्लिम अपना असर रखते हैं। इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20-30 फीसदी के बीच है जबकि 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान 30 प्रतिशत से ज्यादा हैं। राज्य की करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं और करीब 107 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को हमेशा प्रभावित करते हैं। मुरादाबाद में 50.80 फीसदी, रामपुर में 50.57 फीसदी, बिजनौर में 43.04 फीसदी, सहारनपुर में 41.97 फीसदी, मुजफ्फरनगर में 41.11 फीसदी, शामली में 41.73 फीसदी, अमरोहा में 40.78 फीसदी, हापुड़ में 32.39 फीसदी, मेरठ में 34.43 फीसदी, संभल में 32.88 फीसदी, बहराइच में 33.53 फीसदी, बलरामपुर में 37.51 फीसदी, बरेली में 34.54 फीसदी और श्रावस्ती में 30.79 फीसदी मुस्लिम मतदाता है।

वहीं अन्य जिलों जैसे बागपत में 27.98 फीसदी, अमेठी में 20.06 फीसदी, अलीगढ़ में 19.85 फीसदी, गोंडा में 19.76 फीसदी, लखीमपुर खीरी में 20.08 फीसदी, लखनऊ में 21.46 फीसदी, मऊ में 19.46 फीसदी, महाराजगंज में 17.46 फीसदी, पीलीभीत में 24.11 फीसदी, संत कबीरनगर में 23.58 फीसदी, , सिद्धार्थनगर में 29.23 फीसदी, सीतापुर में 19.93 फीसदी और वाराणसी में 14.88 फीसदी आबादी मस्लिमों की है।
2026 में बंगाल और असम में चुनाव
बंगाल और असम में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं लेकिन इन दोनों राज्यों में एआईएमएम चुनाव लड़ेगी या नहीं, अभी इस पर ओवैसी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। इन दोनों ही राज्यों में मुस्लिमों की आबादी अच्छी-खासी है। यहां जीत-हार में मुस्लिम बड़ी भूमिका निभाते हैं। खास तौर से बंगाल जहां सत्ता की चाबी एक तरह से मुस्लिम समुदाय के पास है, यहां चुनाव लड़ने के बारे में ओवैसी ने कहा है कि इस बारे में वह पार्टी के साथ बात करेंगे और इसके बाद बंगाल में चुनाव लड़ने का फैसला करेंगे। असम को लेकर भी उन्होंने अभी कुछ नहीं कहा है लेकिन यूपी में चुनाव लड़ने के लिए वह अभी से तैयारी करने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 2027 में चुनाव होंगे। ओवैसी पहले भी यूपी में विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है लेकिन बिहार चुनाव नतीजे के बाद उन्हें लगता है कि इस बार वह यूपी मे अपना नरेटिव गढ़ने में कामयाब हो जाएंगे। बंगाल में ओवैसी ने 2021 का चुनाव लड़ा था लेकिन वह कोई असर नहीं छोड़ पाए।
बंगाल में करीब 145 सीट पर जीत हार तय करते हैं मुस्लिम
बंगाल में मुसलमानों की करीब 30 प्रतिशत आबादी है। 294 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में होते हैं। राज्य की 46 विधानसभा सीटें तो ऐसी हैं जहां 50 प्रतिशत से भी ज्यादा मुसलमान हैं। 16 सीटें ऐसी हैं जहां इनकी तादाद 40 से 50 प्रतिशत के बीच है। 33 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 से 40 प्रतिशत और 50 सीटों पर 20 से 30 प्रतिशत है। इस तरह करीब 145 सीटों पर मुस्लिम वोटर जीत और हार तय करने में निर्णायक भूमिका में हैं। मालदा, मुर्शीदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जिलों में मुस्लिम आबादी हिंदुओं से ज्यादा है। दक्षिण-24 परगना, नादिया और बीरभूम जिले में भी इनकी अच्छी-खासी आबादी है।
असम में 35 फीसद मुस्लिम मतदाता
असम में कुल वोटर्स में मुस्लिम मतदाता 35 फीसदी हैं। इस राज्य में विधानसभा की कुल 126 सीटें हैं। 34 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां सबसे ज्यादा मुसलमान मतदाता हैं। धुबरी, गोलपाड़ा, बारपेटा, मोरीगांव, नागांव, होजई, करीमगंज, साउथ सलमारा, मनकाचर, हैलाकांडी, दरांग और बोंगाईगांव जिलों में मुस्लिम वोटर जीत-हार में निर्णायक हैं। जाहिर है कि यदि ओवैसी यहां चुनावी अखाड़े में उतरते हैं तो एआईयूडीएफ और कांग्रेस दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनेंगे। असम में अब तक मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और एआईयूडीएफ का साथ देते आए हैं। असम चुनाव में एआईएमआईएम की एंट्री चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प एवं रोचक बनाएगी।

