ईरान और अमेरिका इजरायल के बीच जारी टकराव के बाद क्या यह इस बात के संकेत हैं कि कूटनीति पर जंग भारी पड़ रही है। ऐसे में यह जानना अहम है कि इजरायल-अमेरिका और ईरान के इस टकराव के मायने क्या होंगे और इसका असर मिडिल ईस्ट और विश्व व्यवस्था पर क्या होगा?
पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान की मिसाइलों से जवाबी हमले, और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर प्रहार ने संकेत दिया है कि तनाव अब सीमित बयानबाजी से आगे बढ़ चुका है। ऐसे में सबसे बड़ी बात जो निकलकर सामने आई है वो ये है कि दुनिया की महाशक्तियां अब यह मान चुकी हैं कि शीतयुद्ध के विपरीत वे अपने राष्ट्रीय लक्ष्य वार्ता या कूटनीति से नहीं, बल्कि सैन्य दबाव से हासिल करना सकती हैं। ऐसे में यह जानना अहम है कि क्या कूटनीति पर जंग भारी पड़ रही है। साथ ही यह भी कि इजरायल-अमेरिका और ईरान के इस टकराव के मायने क्या होंगे और इसका असर मिडिल ईस्ट और विश्व व्यवस्था पर क्या होगा?
नई नहीं है यह लड़ाई
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच खींचतान नई नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से तेहरान और वॉशिंगटन के रिश्ते अविश्वास और प्रतिबंधों के दौर से गुजरते रहे हैं। इजरायल और अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय नेटवर्क को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। समय-समय पर परमाणु वार्ताएं शुरू हुईं, समझौते भी हुए और वे टूटे भी। और फिर से बातचीत की कोशिशें हुईं। लेकिन हर चरण के बाद संदेह और गहरा हुआ। ताजा सैन्य कार्रवाई भी इसी को दोहरा रही है।

इस बार हमले का लक्ष्य क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान-इजरायल और अमेरिका के शुरुआती हमले ईरान की परमाणु क्षमता को सीमित करने पर केंद्रित थे। मगर हालिया अभियानों का स्वरूप बदलकर और व्यापक हो गया है। अब दोनों ओर से सैन्य ठिकानों, कमांड स्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स को निशाना बनाया जा सकता है और ऐसा हो भी रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति यह मान चुके हैं कि ईरान की वर्तमान सरकार आतंकवाद की प्रयोजक है और इसलिए उसका सत्ता से जाना तय है। इसीलिए वे लगातार ईरान को निशाना बना रहे हैं, ताकि ईरान की जनता खुद परेशान होकर सत्ता परिवर्तन कर दे। ईरान में हालिया विरोध प्रदर्शन इसी बात की बानगी हैं, तब भी सत्ता परिवर्तन जैसी स्थितियां बन गईं थीं, हालांकि ये संभव नहीं हुआ।

कुछ विश्लेषक इसे ‘डिटरेंस प्लस’ रणनीति कहते हैं- यानी केवल रोकथाम नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वी की दीर्घकालिक क्षमता को कमजोर करना। दूसरी ओर, तेहरान की जवाबी कार्रवाई यह दिखाती है कि वह भी लागत बढ़ाने की नीति अपना रहा है, ताकि प्रतिद्वंद्वी को लंबी लड़ाई का जोखिम समझ आए। विशेषज्ञ इसे सत्ता-परिवर्तन की दिशा में मनोवैज्ञानिक और सैन्य दबाव की रणनीति भी बताते हैं।
कैसी है जंग की प्रकृति?
फिलहाल यह टकराव मुख्यतः हवाई और मिसाइल हमलों तक सीमित दिखता है। जमीनी युद्ध की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय विस्तार का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। लगातार हवाई हमले विरोधी की सैन्य क्षमता को कमजोर करने और राजनीतिक संदेश देने का साधन होते हैं। लेकिन ऐसी रणनीति में अनपेक्षित परिणामों का जोखिम भी रहता है, राष्ट्रवाद बढ़ सकता है, या प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय हो सकते हैं।
कैसा होगा वैश्विक उर्जा आपूर्ति पर असर
मिडिल ईस्ट विश्व ऊर्जा आपूर्ति का अहम केंद्र है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली तेल आपूर्ति में व्यवधान विश्व बाजारों को झटका दे सकता है। यदि हमले बढ़ते हैं तो शिपिंग बीमा, ऊर्जा कीमतें और आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित होंगी। वहीं, क्षेत्रीय देश सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन- सुरक्षा साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेंगे। किसी भी व्यापक फैलाव से बीमा प्रीमियम, शिपिंग रूट और निवेश माहौल प्रभावित हो सकता है।

ईरान के खिलाफ क्या नाटो देश भी आगे आएंगे?
यह साफ है कि सैन्य ताकत के लिहाज से अमेरिका और इजरायल के सामने ईरान कमजोर ही है। बावजूद इसके अगर ईरान ने साहस दिखाते हुए अमेरिका के किसी सैन्य बेस पर हमला किया तो यह नाटो के नियमानुसार सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि नाटो की प्रत्यक्ष भागीदारी कई कारकों पर निर्भर करेगी, हमलों की प्रकृति, कानूनी व्याख्या और सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति। किसी व्यापक सैन्य गठबंधन के सक्रिय होने से संघर्ष का दायरा बढ़ सकता है। अगर नाटो देश भी इसमें कूद पड़े तो उसका हाल भी लीबिया के तानाशाह गद्दाफी की तरह हो सकता है।
अमेरिका-इजरायल के खिलाफ ईरान के समर्थन में रूस और चीन की भूमिका
अमेरिका-इजरायल के खिलाफ ईरान के टकराव में उसके सहयोगी चीन और रूस सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं करेंगे, इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि रूस खुद यूक्रेन से जंग में उलझा है। वहीं चीन इंडो-पैसिफिक प्राथमिकताओं और आर्थिक स्थिरता पर अपना ध्यान लगाए हुए है। दोनों देश प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बच सकते हैं, हां ये हो सकता है कि वे कूटनीतिक मंचों पर सक्रिय रहें। वे बयानबाजी, बैक-चैनल वार्ता या सीमित सहयोग के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या कूटनीति के लिए जगह बची है?
इतिहास को देखें तो पूर्व में हुई तमाम जंगों के बाद अक्सर बातचीत की खिड़की खुलती है। कभी बैक-चैनल से तो कभी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से। यदि दोनों पक्ष ‘रेड लाइन्स’को समझते हुए सीमित दायरे में रुकते हैं, तो तनाव कम करने की पहल संभव है। लेकिन यदि हमले प्रॉक्सी नेटवर्क, समुद्री मार्ग या नागरिक ढांचे तक फैलते हैं, तो कूटनीति और कठिन हो जाएगी।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के अमेरिका और ईरान दोनों से महत्वपूर्ण संबंध हैं। ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता नई दिल्ली की प्राथमिकता होगी। यदि हालात वार्ता की दिशा में बढ़ते हैं, तो भारत एक बेहतर संवादकर्ता की भूमिका निभा सकता है। लेकिन तत्काल चुनौती ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक प्रभावों को संभालने की है।

