बिहार में एक गांव ऐसा है, जहां आम की फसल देखकर किसान अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और मांगलिक कार्य तय करते हैं। वैशाली जिले के हरलोचनपुर सुक्की गांव की मिट्टी वैसे तो हर फसल के लिए उपजाऊ है, लेकिन यहां के किसानों की खुशहाली आम के बागों पर निर्भर करती है। कुल 2200 एकड़ रकबा वाले गांव की 2 हजार एकड़ जमीन पर केवल आम के बाग हैं। इस बार मंजर आने के बावजूद कोरोना संक्रमण (CoronaVirus Infection) के कारण लॉकडाउन (Lockdown) को लेकर किसान (Mango Farmers) परेशान थे। अब लॉकडाउन में ढ़ील के बाद उनके चेहरे फिर खिलने लगे हैं। यहां 15 जून से आम टूटने शुरू हो जाते हैं।
यह गांव आम का इको फ्रेंडली गांव (Eco-friendly Mango Village) है, जहां बागों में विभिन्न वेरायटी के पेड़ हैं। यहां मालदह, सुकुल, बथुआ, सिपिया, किशनभोग, जर्दालु आदि कई प्रकार के आम होते हैं। यह गांव लेट वेरायटी वाले आमों का मायका भी कहा जाता है। यहां के आम पश्चिम बंगाल व उत्तर प्रदेश (UP) सहित देश के कई भागों में भेजे जाते हैं। ये आम बिहार के अन्य जिलों में भी जाते हैं। इसके लिए किसानों को मेहनत नही करनी पड़ती। व्यापारी खुद आकर आम के बाग खरीद लेते हैं।
हर साल नए-नए उपाय कर आम के मंजरों को बचाया जाता है। किसान कीड़े से बचाने के लिए पेड़ के तने पर चूने का घोल लगवाते हैं। मिट्टी की जांच होती है और बागों की सिंचाई कराई जाती है। आम में लगने वाले दूधिया और छेदिया जैसे रोगों से बचाव के लिए छिड़काव किया जाता है। पानी में गोंद घोलकर भी डाला जाता है।
आपको बताते चलें कि किसान एक कट्ठे में 4-5 पौधे लगाते हैं। एक एकड़ में 90 पौधे लगाए जाते हैं। एक तैयार पेड़ में 4 क्विंटल तक फल आते हैं। अगर मौसम ने अच्छा साथ नहीं दिया तो भी औसतन ढ़ाई से तीन क्विंटल फल हर पेड़ पर आते हैं। इस गांव के जितने रकवे में आम के बाग हैं, उनमें करीब सात लाख टन तक उत्पादन होता है।
गांव की यह खुशहाली आजादी के पहले नहीं थी। नून नदी (Noon River) के किनारे बसे इस गांव में बाढ़ (Flood) हर साल किसानों के सपने बहा ले जाती थी। जमीन पर पांव जमाने लायक जगह भी नहीं बचती थी। फसलें मारी जाती थीं। साल 1940 में गांव के बड़े-छोटे जोत वाले किसानों ने बाढ़ से फसल की बर्बादी को देखते हुए आम के पौधे लगाने का निर्णय लिया। देर-सबेर बाकी के किसानों ने भी यही किया। आम से आमदनी के लिए उन्हें 10 वर्षों का इंतजार करना पड़ा, लेकिन साल 1950 के बाद यहां के लोगों की किस्मत बदल गई।
करीब 70 सालों से इस गांव को आम के बाग ही पाल-पोस रहे हैं। गांव में सम्पन्नता और रौनक है तो आम की वजह से। शायद ही कोई ऐसा परिवार है, जिसके दरवाजे पर कार न हो। यहां के लोग बाग में अच्छा मंजर देखकर ही बेटे-बेटी की शादियां तय करते हैं। तीन-चार साल के भीतर गांव में आम पर निर्भर किसानों के घरों की 40-45 बेटियों के हाथ पीले हुए हैं। किसान अपनी आर्थिक जरूरतों को देखते हुए तीन-चार साल के लिए बागों को व्यापारियों को देकर अग्रिम पैसे ले लेते हैं।


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