Somali Jet ने बदला मौसम का मिजाज, जानिए कैसे तय होती है भारत में बारिश की रफ्तार

भारत में मानसूनी बारिश का बहुत बड़ा हिस्सा चार महीनों के दौरान ही होता है। हालांकि, मानसून सिर्फ बादलों और समुद्र की गर्मी पर निर्भर नहीं करता, बल्कि वायुमंडल में चलने वाली शक्तिशाली हवाएं भी इसकी रफ्तार तय करती हैं। इन्हीं में से एक है सोमाली जेट (Somali Jet), जो अरब सागर के ऊपर बहने वाली तेज हवाओं की पट्टी है। यह हिंद महासागर से नमी को भारत तक पहुंचाकर मानसून को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती है। मौसम वैज्ञानिक इसे Low-Level Jet (LLJ) या Findlater Jet के नाम से भी जानते हैं।
भारत में मानसून मुख्य रूप से दो शाखाओं के जरिए पहुंचता है—एक बंगाल की खाड़ी से और दूसरी अरब सागर से। इनमें अरब सागर वाली मानसूनी शाखा पर सोमाली जेट का खास प्रभाव रहता है। इसकी गति और दिशा तय करती है कि पश्चिमी तट और प्रायद्वीपीय भारत में बारिश कितनी सक्रिय होगी। यह शक्तिशाली हवा अरब सागर से नमी लेकर आती है और मानसून को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

क्या है Somali Jet?
सोमाली जेट नाम सुनकर भले ही यह किसी विमान जैसा लगे, लेकिन यह दरअसल वायुमंडल में बहने वाली तेज रफ्तार हवाओं की एक धारा है। यह करीब 1 से 1.5 किलोमीटर की ऊंचाई पर बहने वाली लो-लेवल क्रॉस-इक्वेटोरियल एयरफ्लो है। इसकी शुरुआत मॉरीशस और उत्तरी मेडागास्कर के आसपास से होती है, जो सोमालिया के तट से गुजरते हुए अरब सागर तक पहुंचती है। जून में यह भारत के पश्चिमी तट पर सक्रिय होती है और जुलाई के दौरान इसकी ताकत सबसे अधिक देखी जाती है।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, सोमाली जेट का मुख्य प्रवाह भारतीय प्रायद्वीप के ऊपर करीब 1.5 किलोमीटर की ऊंचाई पर सक्रिय रहता है। गर्मियों के मौसम में इसकी रफ्तार काफी तेज हो जाती है और यह औसतन लगभग 18 मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है। इसकी यही ताकत मानसूनी हवाओं को गति देने में अहम भूमिका निभाती है।

भारत में बारिश कैसे बढ़ाता है Somali Jet?
आसान शब्दों में कहें तो सोमाली जेट नमी से भरी तेज हवाओं की एक धारा है, जो हिंद महासागर और अरब सागर से जलवाष्प लेकर भारत तक पहुंचती है। दक्षिणी हिंद महासागर और एशियाई भूभाग के बीच बने दबाव के अंतर से इन हवाओं को ताकत मिलती है। सोमालिया के तट से गुजरते हुए ये हवाएं अरब सागर से नमी जुटाकर भारतीय मानसून को सक्रिय बनाने में मदद करती हैं।

जब सोमाली जेट से आने वाली नमी भरी हवाएं भारत के पश्चिमी तट से टकराती हैं, तो पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के कारण ये ऊपर उठती हैं और संघनन की प्रक्रिया से तेज बारिश होती है। यही वजह है कि मुंबई, कोंकण, पश्चिमी महाराष्ट्र और गोवा जैसे इलाकों में मानसून के दौरान भारी वर्षा देखने को मिलती है। अरब सागर की मानसूनी हवाएं और पश्चिमी घाट मिलकर इन क्षेत्रों में बारिश को बढ़ावा देते हैं।

Somali Jet के कमजोर होने से क्या होता है?
सोमाली जेट की मजबूती और कमजोरी का असर मानसून की बारिश पर साफ दिखाई देता है। हालांकि पूरे भारत में बारिश सिर्फ इसी एक सिस्टम पर निर्भर नहीं करती, लेकिन इसकी भूमिका काफी अहम होती है। जब सोमाली जेट अरब सागर के ऊपर मजबूत होता है, तो यह ज्यादा नमी भारत तक पहुंचाने में मदद करता है और बारिश बढ़ सकती है। वहीं, कमजोर होने पर मानसूनी गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

सोमाली जेट की स्थिति को देखकर पूरे भारत के मानसून का अंदाजा लगाना सही नहीं है। इसका मजबूत या कमजोर होना बारिश को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन मानसून कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है। इनमें अलनीनो, इंडियन ओशन डाइपोल (IOD), MJO, मानसून ट्रफ और अरब सागर व बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र जैसी मौसमी घटनाएं अहम भूमिका निभाती हैं।

खेती और आम लोगों के लिए क्यों अहम है?
भारत की खेती काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है, इसलिए सोमाली जेट में होने वाले बदलावों पर मौसम वैज्ञानिकों की नजर रहती है। इसकी ताकत और नमी पहुंचाने की क्षमता से पश्चिमी तट, मध्य भारत और अन्य इलाकों में बारिश के पैटर्न पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि मानसून के दौरान इसकी स्थिति को लगातार मॉनिटर किया जाता है।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि Somali Jet भारतीय मानसून का एक अदृश्य किंतु बहुत ही महत्वपूर्ण इंजन है। सोमाली जेट खुद बारिश तो नहीं कराता, लेकिन समुद्र से नमी को भारत तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका अदा करता है।

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