पिछले लगभग एक दशक में नीतीश कुमार चार बार पलटी मार चुके हैं। पहली बार नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा की तरफ से राजग का चेहरा बनाए जाने के विरोध में राजग छोड़कर 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले उतरे। इस चुनाव में नीतीश कुमार को मुंहकी खानी पड़ी थी। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को 16 प्रतिशत वोट तो मिले, मगर केवल दो सीटें ही हाथ लगी। इस परिणाम से कुछ बड़ी बातें सामने आईं।
पहली बात यह कि नीतीश कुमार भले ही सियासी समीकरणों की बदौलत लंबे समय से बिहार के मुख्यमंत्री हों, लेकिन उनकी स्वीकार्यता का दायरा सीमित है। वे अपने दम पर अकेले जनता के बीच से निर्णायक जीत हासिल करके नहीं आ सकते हैं। चुनाव परिणामों से यह साबित हुआ है कि नीतीश कुमार की स्थिति बैसाखी के सहारे खड़े होने वाले नेता की है। वर्ष 2014 का आम चुनाव नीतीश कुमार के लिए लिटमस टेस्ट था। इस टेस्ट में नीतीश अकेले चुनाव लड़कर जीत पाने में मिसफीट साबित हुए। यह भी देखा गया कि त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा सबसे बड़े जनाधार वाली पार्टी बनकर उभरी है। यानी कुछ बड़ी बातें, राजद, कांग्रेस के निजी जनाधार के मामले में बहुकोणीय मुकाबले में भाजपा की स्थिति मजबूत दल की है। वर्ष 2014 का परिणाम नीतीश और राजद दोनों के लिए चिंता बढ़ाने वाला था।
महागठबंधन को राजग की तुलना में अधिक वोट
इन परिणामों से सबक लेते हुए नीतीश कुमार ने एक साल बाद 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में राजद के साथ गठबंधन का निर्णय लिया। यह नीतीश कुमार की दूसरी पलटी थी। इस चुनाव में जदयू और राजद दोनों 101-101 सीटों पर चुनाव लड़े। महागठबंधन को जीत भी मिली। हालांकि बराबर-बराबर सीट पर चुनाव लड़ने के बाद भी राजद की सीटें जदयू से ज्यादा आईं। महागठबंधन को राजग की तुलना में आठ प्रतिशत अधिक वोट मिले थे। नए समीकरण में नई सरकार नीतीश कुमार ने बना तो ली, मगर वह सरकार चल नहीं पाई। तनातनी के बीच 2017 में महागठबंधन से अलग होकर नीतीश कुमार ने राजग के साथ सरकार बना ली। यह उनकी तीसरी पलटी थी।
वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव और 2020 का विधानसभा चुनाव वे राजग का हिस्सा बनकर लड़े। दोनों चुनावों में राजग का हिस्सा होने का लाभ जदयू को भी मिला। हालांकि महागठबंधन में भी जदयू को साङोदार दल राजद की तुलना में कम सीटें मिली और राजग में भी उन्हें भाजपा की तुलना में कम सीटें मिली। इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि गठबंधन में रहते हुए भी जदयू के जीतने की उम्मीद राजद व भाजपा से कम रहती है।
राजग की बिहार सरकार को दो साल भी पूरे नहीं हुए और नीतीश कुमार ने चौथी बार एक बार फिर पलटी मार दी। एक बार फिर वे राजग छोड़कर महागठबंधन का हिस्सा बन गए हैं। नीतीश कुमार द्वारा राजग छोड़ने के कोई ठोस तार्किक कारण समझ नहीं आ रहे। वे खुद भी तार्किक रूप से कुछ नहीं बता पा रहे हैं। ऐसे में हर किसी में मन में यही प्रश्न उठ रहा है कि नीतीश चाहते क्या हैं? क्या नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए बिहार में राजनीतिक अस्थिरता लाने से भी परहेज नहीं करते? हालांकि जदयू और नीतीश कुमार की तरफ से यह कहा गया कि भाजपा द्वारा उनकी पार्टी को तोड़ने की साजिश हो रही थी। इसलिए उन्हें राजग से अलग होना पड़ा, लेकिन केवल इतना कह देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें कोई ठोस आधार तो बताना ही चाहिए, जिसमें भरोसा करने लायक तर्क हो।
आरोपों का विश्लेषण
अगर जदयू द्वारा भाजपा पर ‘पार्टी तोड़ने’ के आरोपों का भी तटस्थ विश्लेषण करें तो इसे विश्वास करने का कोई पर्याप्त कारण नहीं नजर आता। 77 विधायकों वाली भाजपा के पास इतना संख्या बल नहीं है कि वह जदयू के 25-30 विधायक तोड़ भी ले तो अपना मुख्यमंत्री बना सके। अत: एक बनी बनाई सरकार को लोकसभा चुनाव से पहले अकारण तोड़ने का कोई अर्थ नहीं समझ में आता है। जदयू द्वारा भाजपा पर लगाए गए आरोपों के आलोक में इस पर भी गौर करना होगा कि जातिवार जनगणना का विषय जब नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव की लाइन पर चलते हुए उठाया तो भाजपा ने उस पर चर्चा को स्वीकार कर लिया। अगर भाजपा ने इसे स्वीकार नहीं किया होता तो शायद नीतीश इसी को मुद्दा बनाकर गठबंधन से अलग होने का निर्णय लेते। किंतु भाजपा द्वारा जातिवार जनगणना के विषय पर सकारात्मक रुख रखने से बिहार की सामाजिक संरचना में उथल-पुथल लाने की संभावना देख रही राजद और जदयू को निराशा हाथ लगी। एक मुद्दा मानो उनके हाथ से फिसल गया।
दूसरा बड़ा मामला आरसीपी सिंह से जुड़ा है। आरसीपी सिंह को जब केंद्र की राजग सरकार में मंत्री बनाया गया, तब नीतीश कुमार ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। आरसीपी सिंह तब जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। उनके मंत्री बनने के लगभग एक साल बाद जब उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हुआ तो जदयू ने उन्हें अगला कार्यकाल नहीं दिया। लिहाजा उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा ने वही किया जो जदयू की तरफ से निर्णय लिया गया। भाजपा ने यदि अपनी मर्जी से आरसीपी सिंह को मंत्री बनाया होता तो उन्हें अपने कोटे से राज्यसभा भेजकर उनका मंत्री पद बचाने का प्रयास करती। ललन सिंह सहित जदयू के अन्य नेताओं द्वारा दिए गए बयानों से लगता है कि यह जदयू का आंतरिक मामला है। इसमें भी भाजपा की भूमिका होने का कोई आधार नहीं नजर आता।
गौर करना होगा कि इस पाला बदल के कुछ दिनों पहले ही पटना में भाजपा के कई मोर्चो का एक बड़ा अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन में गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत कई राष्ट्रीय नेताओं ने कहा कि 2025 का चुनाव नीतीश कुमार के चेहरे पर ही एनडीए लड़ेगी और बिहार में नीतीश कुमार ही एनडीए के नेता हैं। अत: इसके बाद इस पर संदेह करने का कोई प्रश्न नहीं उठना चाहिए था। इसके बावजूद नीतीश कुमार ने अलग होने का निर्णय लिया। परंतु जिस ढंग से नीतीश ने पाला बदला है उससे यही लगता है कि वे ऐसा करने का मन पहले ही बना चुके थे। उन्हें किसी ठोस कारण की तलाश थी, जो उन्हें नहीं मिल सका। अंतत: उन्होंने बिना ठोस कारण के ही एक हवा-हवाई आधार पर गठबंधन तोड़ दिया।
समीकरणों का सहारा
नीतीश कुमार को यह आभास है कि उनकी लोकप्रियता कम हुई है। वे केवल समीकरणों के सहारे गद्दी पर बैठे बादशाह हैं। लिहाजा अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए वे बिहार की राजनीति को अस्थिरता की बलि देने से भी गुरेज नहीं कर रहे। विकास के अनेक पैमानों पर पहले से फिसड्डी बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का बने रहना राज्य के लिए चिंताजनक है।
एक कहावत है- भागते भूत की लंगोटी ही भली। नीतीश कुमार अब अपनी राजनीति और उम्र के अंतिम पड़ाव की ओर हैं। ऐसे में वह सफलता-असफलता से परे प्रासंगिक बने रहने में जुटे हैं। दिल में दबी महत्वाकांक्षाओं पर एक दांव और खेलना चाहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे यशवंत सिन्हा को बखूबी मालूम था कि वह राष्ट्रपति का चुनाव नहीं जीतने जा रहे, लेकिन प्रासंगिक बने रहने के लिए राष्ट्रपति चुनाव में उतरे। ठीक वैसे ही नीतीश कुमार के मन में दबा हुआ ‘प्राइम मिनिस्टर मटेरियल’ उन्हें राजनीतिक अखाड़े में बने रहने के लिए उकसा रहा है। इस भावना की तुष्टि के लिए उनके पास एनडीए से अलग होने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। वे अलग हो भी गए। अब संभव है कि विपक्षी एकजुटता के मंचों पर नीतीश कुमार भी एक दावेदार के नाते दिखने लगेंगे। शायद यही उनकी अंतिम राजनीतिक इच्छा भी है। अपनी महत्वाकांक्षाओं में वे कितना सफल-असफल होंगे, यह तो समय बताएगा।
भाजपा के लिए चुनौती के साथ अवसर भी
गठबंधनों के सियासी खेल में बड़ा भाई-छोटा भाई का द्वंद्व भी बहुत रोचक है। महाराष्ट्र में दशकों तक शिवसेना बड़ा भाई होने के दावे के साथ भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में रही। जब दोनों दल अलग हुए और अलग-अलग चुनाव लड़े तो आंकड़ों में यह पता चला कि जिसे छोटा भाई कहा जा रहा था, उसे महाराष्ट्र की जनता बड़ा भाई मानती है। कुछ ऐसा ही बिहार में जदयू-भाजपा के साथ भी है।
दरअसल लंबे समय तक गठबंधन में साथ रहे भाजपा-जदयू गठबंधन में जदयू खुद को बड़ा भाई मानता रहा है। जदयू स्वयं ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती रही है। गठबंधन में रहते हुए भाजपा के खाते में कम सीटें आई। मुख्यमंत्री जदयू का रहा तो उपमुख्यमंत्री भाजपा के खाते में आया। प्रशासन पर जदयू का नियंत्रण ज्यादा रहा। लेकिन पहली बार जब वर्ष 2014 में दोनों दल अलग-अलग लोकसभा चुनाव लड़े तो पता चला कि भाजपा का जनाधार जदयू से 10 प्रतिशत ज्यादा मतों का है। जब 2020 विधानसभा चुनाव में मामूली अंतर से लगभग बराबर-बराबर के समझौते में चुनाव लड़े तो परिणामों में भाजपा बड़ा भाई बनकर उभरी। शायद यह बात जदयू को ज्यादा अखरती हो।
खैर, अब जब एक बार फिर भाजपा और जदयू अलग-अलग रास्ते पर हैं तो भाजपा के सामने चुनौती भी है और अवसर भी। एक तरफ जहां राजद, जदयू, हम और वाम दलों की एकजुटता की चुनौती है तो वहीं दूसरी तरफ 243 विधानसभा सीटों पर अब आर-पार की लड़ाई के लिहाज से अपने संगठन का और राजनीतिक विस्तार करने का अवसर भी है। गठबंधन में रहते हुए भाजपा के लिए जदयू के खाते में आई सीटों पर अपना राजनीतिक और सांगठनिक अभियान मुखर रखने में पहले गठबंधन की मर्यादा आड़े आती थी। अब भाजपा इस मर्यादा से मुक्त है। ऐसे में भाजपा के पास बिहार के हर विधानसभा क्षेत्र के हर मंडल और हर बूथ तक अपनी नीति, निर्णय और नेतृत्व की स्पष्टता के साथ जाने का अवसर है। सरकार की नाकामियों पर मुखरता से खड़े होने का अवसर है। नीतीश कुमार की अगुवाई में बिहार राजनीतिक अस्थिरता के जिस अधर में फंसा हुआ है, उसे एक नए विकल्प के साथ निकाल कर लाने का भी अवसर है।

