Godzilla El Nino

146 साल में सबसे सूखा रहा जून!, वैज्ञानिक क्यों बोले- भारत में भयंकर अकाल ला सकता है ‘गॉडजिला’?

प्रशांत महासागर में कुछ ऐसा हो रहा है, जो भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम को उलट-पुलट कर सकता है. नासा के सैटेलाइट ने समुद्र में जमा हो रही भारी गर्मी की तस्वीरें जारी की हैं. 8 जून 2026 को ली गई इन तस्वीरों में मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र का जलस्तर सामान्य से कहीं ज्यादा दिख रहा है. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि 1997 के बाद ऐसी स्थिति नहीं बनी थी. 29 साल पहले इतिहास का सबसे शक्तिशाली अल नीनो बना था, जिसे ‘गॉडजिला अल नीनो’ कहा गया. अब जून 2026 में वैसी ही स्थिति बनती दिख रही है. लेकिन भारत के लिए इसका क्या मतलब है…

‘गॉडजिला अल नीनो’ है क्या?

‘अल नीनो’ कोई नई चीज नहीं है. यह एक नैचुरल प्रोसेस है, जिसमें प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय इलाके का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. ‘गॉडजिला’ शब्द का इस्तेमाल तब होता है जब यह अल नीनो बहुत ही ताकतवर हो.

जब प्रशांत महासागर की ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ती हैं, तो इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास जमा गर्म पानी पूर्व की ओर दक्षिण अमेरिका के तट की तरफ बहने लगता है. इससे ठंडे गहरे पानी का उभार कम हो जाता है और समुद्र की सतह का तापमान तेजी से बढ़ जाता है.

समुद्र की सतह के नीचे ‘केल्विन वेव्स’ नाम की बड़ी-बड़ी जल तरंगें गर्मी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रही हैं. ये तरंगें सैकड़ों किलोमीटर चौड़ी होती हैं और गर्म पानी का एक बड़ा भंडार पूर्वी प्रशांत की तरफ ले जा रही हैं. पूर्वी प्रशांत महासागर अभी 1997 जितना गर्म नहीं है, लेकिन नई केल्विन तरंगें लगातार वहां पहुंच रही हैं, यानी हालात और गंभीर हो सकते हैं. 11 जून 2026 को अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने आधिकारिक तौर पर अल नीनो की घोषणा कर दी है.

भारतीयों को इससे क्या लेना-देना?

अल नीनो का भारत के मानसून पर सीधा निगेटिव इम्पैक्ट होता है. जब प्रशांत महासागर गर्म होता है, तो हिंद महासागर से आने वाली नम हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं. वहीं, IMD ने अपना पूर्वानुमान घटाकर 90% कर दिया है. यानी सामान्य बारिश के मुकाबले 10% कम बारिश होने की संभावना है. अप्रैल में यह अनुमान 92% था. 84% संभावना है कि इस साल सामान्य से कम बारिश होगी. 60% संभावना है कि बारिश ‘अपर्याप्त’ कैटेगरी में रहेगी, यानी 90% से भी कम.

अगर यह पूर्वानुमान सही रहा, तो 2026 11 साल में सबसे सूखा साल होगा. आखिरी बार 2015 में इतनी कम बारिश (86% LPA) हुई थी. मानसून की शुरुआत भी देरी से हुई. यह 4 जून को केरल पहुंचा, जबकि आम तारीख 1 जून है. 23 जून तक देशभर में 46% की भारी बारिश की कमी दर्ज की गई.

यह महीना 146 साल में सबसे सूखा जून बना सकता है. देश में 4 से 23 जून के बीच सिर्फ 56.7 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य 104.6 मिमी होनी चाहिए थी.

किस राज्य में कितनी कम बारिश?

हालात हर राज्य में एक जैसे नहीं हैं. कुछ राज्य बुरी तरह प्रभावित हैं, तो कुछ अभी ठीक हैं. 4-23 जून 2026 तकसबसे ज्यादा प्रभावित राज्य:

राज्य बारिश की कमी
गुजरात 85%
महाराष्ट्र 82-85%
मेघालय 81%
छत्तीसगढ़ 69-71%
झारखंड 66-71%
मध्य प्रदेश 58%
महाराष्ट्र 85% की कमी के साथ सबसे बुरी तरह प्रभावित है. गुजरात 85% की कमी के साथ दूसरे नंबर पर है. छत्तीसगढ़ और झारखंड में 71% तक की कमी है. मध्य प्रदेश देश का केंद्रीय कृषि बेल्ट है, जहां 58% की कमी है. उत्तर प्रदेश की 34 जिलों में बारिश की बहुत कमी है. कर्नाटक, तेलंगाना और बिहार भी बारिश के लिए तरस रहे हैं. राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर नॉर्मल कैटेगरी में हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह अंतर बताता है कि कुल बारिश का राष्ट्रीय औसत अंदाजे से उलट हो सकता है. मुख्य कृषि राज्यों में भारी कमी खाद्य उत्पादन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है.

किसानों और खेती पर क्या असर पड़ेगा?

भारत की आबादी करीब 50% खेती पर निर्भर है. आधे से ज्यादा बोया गया क्षेत्र पूरी तरह बारिश पर निर्भर है, सिंचाई पर नहीं. चावल, दालें, सोयाबीन, मूंगफली, कपास और मक्का जैसी खरीफ फसलें जून-सितंबर की बारिश पर ही टिकी हैं.

खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अल नीनो मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे चावल और मक्का जैसी बारिश पर निर्भर फसलें बर्बाद हो सकती हैं.

महंगाई और आम आदमी पर क्या असर?

सबसे बड़ा खतरा महंगाई का है. खाने-पीने की चीजें भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का 37% हिस्सा हैं. अल नीनो वाले सालों में खाद्य महंगाई सामान्य सालों से 1.7% ज्यादा रही है. कम बारिश का मतलब फसलें कम, आपूर्ति कम और दाम ज्यादा. चावल, दालें और सब्जियों समेत सब कुछ महंगा हो सकता है.

क्या देशभर में पानी की किल्लत शुरू हो गई है?

एक राहत की बात है देश के बड़े जलाशय पिछले 10 साल के औसत से काफी ऊपर तक भरे हुए हैं. इससे बुआई के दौरान सिंचाई को कुछ राहत मिलेगी. पिछले एक दशक में सिंचाई कवरेज 55% तक पहुंच गई है. लेकिन चिंता की बात है कि दक्षिण भारत के जलाशय पिछले साल और सामान्य दोनों से कम भरे हैं. पूर्वी इलाके भी सामान्य से कम स्तर पर है. अगर बारिश नहीं हुई तो पीने के पानी की किल्लत भी बढ़ सकती है.

दूसरी तरफ, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 150-200 जिलों को ‘प्रायोरिटी मॉनिटरिंग’ के तहत रखा है. हर जिले के लिए अलग-अलग फसल योजनाएं बनाई जा रही हैं. किसानों को सूखा-ताजा बीज, कम पानी वाली फसलें और नमी बचाने के तरीके बताए जा रहे हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) ने AI-बेस्ड सूखा की चेतावनी देने वाला सिस्टम ‘सुखरक्षक’ बनाया है, जो 22 से ज्यादा भारतीय भाषाओं में किसानों को हर जिले के लिए खास सलाह देता है. लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगले 6 हफ्तों की बारिश तय करेगी कि यह सीजन कैसा रहेगा.

तो क्या वाकई सूखा पड़ेगा या कोई रास्ता बचा है?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, जून-अगस्त 2026 के दौरान अल नीनो की संभावना 80% है और नवंबर तक यह 90% से ऊपर रहेगी. 1997-98 के ‘गॉडजिला अल नीनो’ ने दुनिया के कई हिस्सों में भीषण बाढ़, सूखा, फसलों को भारी नुकसान और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दी थी. 2026 का अल नीनो उसी दिशा में बढ़ सकता है.

पर्यावरणविद सुभाष सी. पांडे का कहना है कि यह कोई मामूली मौसमी बदलाव नहीं है. प्रशांत महासागर में गर्मी जमा हो रही है, केल्विन तरंगें चल रही हैं और भारत का मानसून कमजोर पड़ रहा है. अगले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि यह ‘गॉडजिला’ कितना तबाही मचाता है. लेकिन एक बात तय है कि जून 2026 पहले ही 146 साल में सबसे सूखा जून बन चुका है.

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