इजरायल के चुनावों पर भारत की नजर क्यों? रक्षा, व्यापार और ईरान से जुड़े हैं बड़े हित

इजरायल के संसदीय चुनावों पर भारत समेत दुनिया के कई देशों की नजर बनी हुई है। नई दिल्ली के लिए ये चुनाव रणनीतिक और कूटनीतिक लिहाज से काफी अहम हैं। इजरायल में किसकी सरकार बनती है, इसका असर भारत के साथ रक्षा सहयोग, व्यापारिक संबंधों और पश्चिम एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है। खासकर ईरान से जुड़े क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए भारत इन चुनावों के नतीजों और संभावित राजनीतिक बदलावों पर करीब से नजर रख रहा है। आखिर इजरायल के चुनाव भारत के लिए क्यों मायने रखते हैं? आइए, इसके पीछे की प्रमुख वजहों को समझते हैं।

रक्षा और रणनीतिक साझेदारी
भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। इजरायल भारत को हथियारों, आधुनिक सैन्य तकनीक, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और आतंकवाद-रोधी उपकरणों की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। दोनों देशों का सहयोग अब केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त अनुसंधान और रक्षा तकनीक के सह-विकास तक भी पहुंच चुका है। भारत इजरायल से हेरॉन ड्रोन, बराक-8 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अत्याधुनिक रडार तकनीक जैसी सैन्य प्रणालियां हासिल करता है। नवंबर 2025 में रक्षा सहयोग को लेकर दोनों देशों के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे। इसके बाद फरवरी 2026 में रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करते हुए इसे ‘शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया गया। ऐसे में इजरायल में होने वाले राजनीतिक बदलाव भारत की रक्षा जरूरतों और भविष्य के सैन्य सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

चुनावों पर नजर क्यों?
भारत के लिए इजरायल में राजनीतिक नेतृत्व का बदलाव रक्षा और सुरक्षा सहयोग के लिहाज से काफी अहम है। नई दिल्ली चाहती है कि बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार बनी रहे या सत्ता की कमान किसी नए नेतृत्व के हाथों में जाए, दोनों देशों के बीच रक्षा समझौतों, आधुनिक सैन्य तकनीक और तकनीक हस्तांतरण की प्रक्रिया प्रभावित न हो। भारत की प्राथमिकता है कि राजनीतिक बदलाव के बावजूद इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनी रहे और रक्षा परियोजनाओं में किसी तरह की रुकावट न आए।

व्यापार, प्रौद्योगिकी और ‘आत्मनिर्भर भारत‘
रक्षा सहयोग के साथ-साथ भारत और इजरायल के बीच व्यापारिक रिश्ते और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी भी लगातार मजबूत हो रही है। दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, कृषि और जल प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के विजन में इजरायली तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में इजरायल में नई सरकार के गठन और राजनीतिक समीकरणों में होने वाले बदलाव का असर दोनों देशों के व्यापारिक समझौतों और तकनीकी सहयोग पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत की नजर इजरायल के राजनीतिक घटनाक्रम पर बनी हुई है।

पश्चिम एशिया के समीकरण और ‘ईरान’ का फैक्टर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान-इजरायल के बीच टकराव भारत के ऊर्जा और सामरिक हितों को प्रभावित कर सकता है। संघर्ष बढ़ने से तेल आपूर्ति, हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले व्यापार और खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है। भारत के इजरायल और ईरान, दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। ईरान में चाबहार बंदरगाह परियोजना भी भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। ऐसे में इजरायल की नई सरकार का ईरान के प्रति रुख क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की पश्चिम एशिया नीति को प्रभावित कर सकता है।

क्या नेतन्याहू के हारने/जीतने से फर्क पड़ेगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच करीबी संबंधों के चलते इजरायल में उनकी जीत से भारत-इजरायल सहयोग में निरंतरता बनी रह सकती है। हालांकि, नया नेतृत्व आने पर भी दोनों देशों के संबंध पूरी तरह किसी एक नेता पर निर्भर नहीं हैं, क्योंकि रक्षा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी मजबूत संस्थागत आधार पर टिकी है। इसके बावजूद, इजरायल की नई सरकार की नीतियां भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि भारत की नजर चुनाव परिणामों के साथ-साथ पश्चिम एशिया में बनने वाले नए राजनीतिक समीकरणों पर भी है।

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