बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भले ही एक भी सीट न जीती हो, लेकिन 35 विधानसभा क्षेत्रों में उसके वोट जीत के अंतर से ज्यादा रहे। इन सीटों पर JSP की मौजूदगी ने मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया और एनडीए से लेकर महागठबंधन तक सभी दलों के समीकरण बदल दिए। जानें कैसे जन सुराज ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया, पार्टी का बढ़ता जनाधार कैसा दिखा और बिहार की राजनीति में इसका क्या असर पड़ सकता है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में भले ही प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज एक भी सीट नहीं जीत पाई हो, लेकिन इसके आधार पर पार्टी के भविष्य का आकलन करना जल्दबाजी होगी। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सीट-दर- सीट विश्लेषण ये साबित करता है कि पार्टी की मौजूदगी ने चुनावी समीकरण को गहराई से प्रभावित किया है। भले ही जन सुराज की तकरीबन 99 फीसदी सीटों पर जमानत जब्त हो गई हो लेकिन शुक्रवार को आए नतीजे बताते हैं कि 35 विधानसभा क्षेत्रों में जन सुराज को मिले वोट, जीत के अंतर से ज्यादा थे। यह साफ संकेत है कि जन सुराज ने कई जगह मुकाबला त्रिकोणीय बनाया और जीत-हार का अंतर पूरी तरह बदल दिया।
कैसे बदला 35 सीटों का समीकरण
चुनावी डेटा यह दिखाता है कि जहां-जहां जन सुराज ने अपेक्षा से अधिक वोट हासिल किए, वहां मुख्य मुकाबले का संतुलन बदल गया। इन 35 सीटों पर जन सुराज के उतने वोट थे कि अगर पार्टी मौजूद न होती, तो नतीजे बिल्कुल अलग हो सकते थे। हालांकि यह कहना संभव नहीं कि ये वोट किस दल को जाते, लेकिन इतना जरूर है कि पीके की पार्टी ने मुकाबले की दिशा बदल दी और कई बड़े खिलाड़ियों का समीकरण बिगाड़ दिया।
NDA को मिला बड़ा फायदा
इन 35 सीटों में से 19 सीटें NDA ने जीतीं। खास बात यह है कि इनमें से 10 सीटें जनता दल (यू) के खाते में गईं, जबकि 5 सीटें भाजपा ने जीतीं। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने तीन और रालोजपा ने एक सीट अपने नाम की। साफ संकेत है कि जन सुराज की मौजूदगी ने कई क्षेत्रों में महागठबंधन का वोट बैंक कमजोर किया, जिससे NDA को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। कई सीटों पर जन सुराज के वोट इतने निर्णायक रहे कि महागठबंधन और NDA के बीच जीत-हार का फर्क बेहद कम हो गया।
महागठबंधन की चुनौतियों में इजाफा
दूसरी तरफ महागठबंधन ने प्रभावित सीटों में 14 पर जीत हासिल की, लेकिन विश्लेषण बताता है कि इनमें से कई सीटें जनसुराज के कारण तगड़ी टक्कर में बदल गईं। जिन सीटों पर राजद, कांग्रेस और वामदलों ने जीत दर्ज की, वहां भी जन सुराज के वोट जीत के अंतर से अधिक थे। इससे स्पष्ट होता है कि जनसुराज ने महागठबंधन के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध तो नहीं लगाई, लेकिन मुकाबले की दिशा जरूर बदल दी। दो ऐसी ही सीटों पर जहां जनसुराज के वोट जीत के अंतर से कहीं ज्यादा थे, AIMIM और BSP ने जीत हासिल की, इससे यह साफ होता है कि जन सुराज की मौजूदगी ने सिर्फ बड़े गठबंधनों को नहीं, बल्कि छोटे दलों के परिणामों को भी प्रभावित किया।
ग्राउंड पर जन सुराज का उभार
यह चुनाव पहला था और इसके बावजूद पार्टी 115 सीटों पर तीसरे नंबर पर रही। मढ़ौरा में जन सुराज का उम्मीदवार दूसरे स्थान तक पहुंच गया। इसका कारण सिर्फ प्रशांत किशोर की लोकप्रियता नहीं, बल्कि यह तथ्य भी था कि कई क्षेत्रों में जन सुराज को NDA समर्थित वोट भी मिले। मढ़ौरा सीट पर जन सुराज को 58,000 से अधिक वोट मिले और पार्टी दूसरे स्थान पर रही। हालांकि यहां जनसुराज के प्रदर्शन में NDA के समर्थन की बड़ी भूमिका थी। लोजपा (रामविलास) की प्रत्याशी सीमा सिंह का नामांकन रद्द होने के बाद NDA ने जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार नवीन कुमार सिंह को समर्थन दे दिया था। इसलिए इस सीट पर मिले वोट जन सुराज के स्वतंत्र ग्राउंड सपोर्ट का प्रतिबिंब नहीं माने जा सकते। फिर भी, इस प्रदर्शन ने पार्टी की चर्चा को बढ़ाया। इस प्रदर्शन ने प्रशांत किशोर को एक ‘उभरते विकल्प’ की छवि जरूर दी है। गांव-गांव में प्रशांत किशोर की यात्राओं, पदयात्राओं और सीधे संवाद ने लोगों के बीच भरोसा और उत्सुकता दोनों पैदा की है।
आदर्श राजनीति का वादा और पीके की अपील
प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में ‘आदर्श, मुद्दा-आधारित और विकास-केंद्रित राजनीति’ की बात करते हुए मैदान में उतरे। उनके अभियान में भ्रष्टाचार, रोजगार, पलायन और शिक्षा जैसे मूलभूत मुद्दे प्रमुख रहे। सामाजिक न्याय या जातीय समीकरणों से परे ‘इश्यू-बेस्ड पॉलिटिक्स’ की बात करने वाली जन सुराज ने युवाओं और शिक्षित वर्ग में एक उम्मीद जगाई। इसी कारण भले ही वोट प्रतिशत कम लगा हो, लेकिन जमीन पर जन सुराज के प्रति, खासतौर पर शुरुआती फेज में एक ‘क्रेज’ साफ महसूस हुआ।
बिहार की राजनीति में नई दिशा ?
कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा था कि प्रशांत किशोर सिर्फ ‘वोटकटवा’ की भूमिका निभाएंगे। यह बात आंशिक रूप से सही भी दिखती है, क्योंकि जन सुराज ने किसी एक पार्टी के वोट सीधे तौर पर नहीं काटे, लेकिन 35 सीटों पर मुकाबले का पूरा गणित जरूर बदल दिया। इन सीटों के नतीजे यह स्पष्ट करते हैं कि जन सुराज का ग्राउंड-इंपैक्ट छोटा ही सही मगर वास्तविक है और आने वाले चुनावों में यह पार्टी तीसरा विकल्प बन सकती है। बिहार की राजनीति लंबे समय से दो बड़े गठबंधनों के बीच बंटी रही है, लेकिन जन सुराज का उभार एक नए राजनीतिक विकल्प के जन्म का संकेत देता है। बहरहाल, सच्चाई यह भी है कि कुछ भी पुष्टता से कह पाना केवल जल्दबाजी होगी।

