कृष्ण की नगरी में इन दिनों होली की धूम मची है। ब्रज के प्रसिद्ध श्री द्वारकाधीश मंदिर में होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। बसंत पंचमी से ब्रज में शुरु हुई होली का आनंद लेने के लिए देश के कोने-कोन से श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने का सिलसिला जारी है। मंगलवार को बरसाना और सोमवार को नन्दगांव में लट्ठमार होली का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद अब श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली लट्ठमार होली खेली जाएगी।
ब्रज की होली के बारे में कहावत है कि ‘सब जग होरी या जग होरा। ऐसा इसलिए क्योंकि यह 40 दिनों तक चलता हैं। ब्रज में बसंत पंचमी पर होली का डंडा गड़ने के साथ ही ब्रज के सभी मंदिरों और गांव में होली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। लेकिन खासतौर से होली महोत्सव फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी से यानी लड्डू फेक होली से शुरू होता है। यह इस बार 10 मार्च को है। होली के त्योहार को गोकुल, वृंदावन और मथुरा में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यहां रंग वाली होली से पहले लड्डू, फूल और छड़ी वाली होली भी मनाई जाती है। इसके बाद बरसाने और नंदगांव में लठमार होली का आयोजन होता है। ब्रज के होली कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए देश और दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं।
रंगों से होली की मस्ती में लोग झूमते हुए नजर आ रहे हैं। होली रसिया गायन होली गीतों के साथ पूरा वातावरण होली के रंगों में सराबोर हो गया है। मथुरा में होली का विशेष महत्व है। दरअसल गोकुल बालकृष्ण की नगरी है। यहां उनके बालस्वरूप को ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण के बचपन की शरारतों को याद करते हुए गोकुल मे छड़ीमार होली खेली जाती है। यहां फाल्गुन शुक्लपक्ष द्वादशी को प्रसिद्ध छड़ीमार होली खेली जाती है।

जिसमें गोपियों के हाथ में लट्ठ नहीं, बल्कि छड़ी होती है और होली खेलने आए कान्हाओं पर गोपियां छड़ी बरसाती हैं। मान्यता के अनुसार बालकृष्ण को लाठी से चोट न लग जाए, इसलिए यहां छड़ी से होली खेलने की परंपरा है। गोकुल में होली द्वादशी से शुरू होकर धुलेंडी तक चलती है। दरअसल, कृष्ण-बलराम ने यहां ग्वालों और गोपियों के साथ होली खेली थी। कहा जाता है कि इस दौरान कृष्ण भगवान सिर्फ एक दिन यानी द्वादशी को बाहर निकलकर होली खेला करते थे। गोकुल में बाकी दिनों में होली मंदिर में ही खेलने की परंपरा है।

