करीब 55 साल पहले इंसान ने पहली बार चंद्रमा पर कदम रखा था। 1969 में नासा के अपोलो-11 मिशन ने इतिहास रचा, जिसके बाद कई देशों ने चंद्रमा की कक्षा, सतह और संसाधनों का अध्ययन करने के लिए कई मिशन भेजे। अब फोकस सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचने का नहीं, बल्कि वहां मौजूद संसाधनों का पता लगाकर भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और मानव बस्तियों की संभावनाएं तलाशने का है। इसी दिशा में चीन ने भी बड़ा कदम उठाते हुए चंद्रमा पर पानी की खोज का अभियान तेज कर दिया है।
चीन अपने महत्वाकांक्षी चांग’ई-7 मिशन के जरिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की गहराई से जांच करेगा। मिशन का मुख्य फोकस उन स्थायी छायादार क्षेत्रों का अध्ययन करना है, जहां वैज्ञानिकों को पानी की बर्फ मिलने की उम्मीद है। चांग’ई-7 यह पता लगाएगा कि बर्फ कहां मौजूद है, उसकी मात्रा कितनी है और क्या भविष्य के चंद्र अभियानों में उसका उपयोग किया जा सकता है।
चंद्रमा पर पानी की तलाश क्यों हो रही है?
वैज्ञानिकों को लंबे समय से चंद्रमा पर पानी के संकेत मिलते रहे हैं, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती उसकी वास्तविक स्थिति और उपयोगिता को समझना है। शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि पानी बर्फ के रूप में मौजूद है या चंद्रमा की मिट्टी में छिपा है, उसकी मात्रा कितनी है और क्या भविष्य में उसे निकालकर पीने, वैज्ञानिक अनुसंधान या रॉकेट ईंधन बनाने जैसे कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
चंद्रमा के अंधेरे क्रेटर में ही क्यों है बर्फ?
चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में कई ऐसे गहरे क्रेटर हैं, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। इन स्थायी छायादार इलाकों में तापमान बेहद कम रहता है, इसलिए यहां पानी की बर्फ लंबे समय से सुरक्षित होने की संभावना मानी जाती है। हालांकि, लगातार अंधेरा, खड़ी ढलान और ऊबड़-खाबड़ सतह इन क्षेत्रों की खोज को बेहद चुनौतीपूर्ण बनाते हैं, जिससे सामान्य रोवर के लिए वहां पहुंचना आसान नहीं होता।
क्या है चांग’ई-7 मिशन?
चांग’ई-7 चीन के चंद्र मिशन का अहम पड़ाव है, जिसे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतारने की योजना है। इस मिशन में ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और हॉपर शामिल होंगे, जो मिलकर सतह और आसपास के स्थायी छायादार क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे। मिशन का उद्देश्य चंद्रमा की मिट्टी, भूगर्भीय संरचना और संभावित जल-बर्फ के बारे में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी जुटाना है।
च्वेछियाओ-2 भी देगा मिशन का साथ
चांग’ई-7 मिशन की संचार व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए चीन क्वेचियाओ-2 (Queqiao-2) रिले सैटेलाइट का इस्तेमाल करेगा। यह उपग्रह चंद्रमा और पृथ्वी के बीच डेटा व संदेशों का आदान-प्रदान आसान बनाएगा, खासकर दक्षिणी ध्रुव के उन गहरे और अंधेरे क्षेत्रों में जहां सीधा संपर्क संभव नहीं है। इससे मिशन के वैज्ञानिक आंकड़े सुरक्षित और तेज़ी से पृथ्वी तक पहुंच सकेंगे।
चीन को चंद्रमा की बर्फ से क्या फायदा हो सकता है?
चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी भविष्य के मानव मिशनों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। यदि वहां की बर्फ से पानी निकाला जा सका, तो अंतरिक्ष यात्रियों की जरूरतें पूरी करने के साथ-साथ उससे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तैयार कर रॉकेट ईंधन भी बनाया जा सकेगा। इससे भविष्य में चंद्रमा अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक अहम पड़ाव बन सकता है। हालांकि, इसके लिए पहले यह साबित करना होगा कि वहां पर्याप्त मात्रा में बर्फ मौजूद है और उसे निकालना तकनीकी व आर्थिक रूप से संभव है।
नासा का रास्ता चीन से अलग क्यों है?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चीन के साथ अमेरिका की भी नजर है। नासा अपने आर्टेमिस कार्यक्रम के जरिए भविष्य में चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव गतिविधियों की तैयारी कर रहा है। हालांकि दोनों की रणनीति अलग है—चीन चांग’ई-7 जैसे सरकारी मिशनों के जरिए एक साथ कई तकनीकों का परीक्षण कर रहा है, जबकि नासा CLPS कार्यक्रम के तहत निजी कंपनियों की मदद से वैज्ञानिक उपकरण चंद्रमा तक पहुंचा रहा है।

