आसमान से मिसाइलें और ड्रोन बरसा रहा ईरान, फिर भी क्यों पलटवार से डर रहे अरब देश?

ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने न सिर्फ खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। यही नहीं, उसने दुबई और अबू धाबी के आलीशान होटलों और आवासीय क्षेत्रों पर भी हमला किया। ईरान द्वारा औद्योगिक और नागरिक इलाकों पर हमले के बावजूद लगभग सभी अरब देशों ने अब तक संयम दिखाया है। आखिर क्यों?

पिछले तीन दशकों में बहरीन, कतर, कुवैत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने अस्थिर मध्य पूर्व में स्थिरता की छवि बनाई। लेकिन इस क्षेत्र के बारे में यह धारणा अब बदल चुकी है। इसकी वजह है ईरान और इजराइल-अमेरिका युद्ध। इजराइल-अमेरिका ने ईरान पर धावा बोला तो ईरान ने अरब स्थित अमेरिका के मित्र देशों को हमलों से दहला दिया। ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने न सिर्फ खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। यही नहीं, उसने दुबई और अबू धाबी के आलीशान होटलों और आवासीय क्षेत्रों पर भी हमला किया। ईरान द्वारा औद्योगिक और नागरिक इलाकों पर हमले के बावजूद लगभग सभी अरब देशों ने अब तक संयम दिखाया है और तेहरान से उलझने में दूरी बनाए रखी है। आखिर क्यों नहीं दे रहे ये देश ईरान को जवाब, किस बात का डर सता रहा है, विस्तार से समझते हैं।

ईरान को किसी ने नहीं दी चुनौती

लगभग पूरे मध्य पूर्व को अपनी चपेट में ले चुके इस युद्ध के तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन ईरान को चुनौती किसी भी देश ने नहीं दी है। यहां तक कि ताकतवर सऊदी अरब ने भी चुप्पी साथ रखी है। क्षेत्र में वर्चस्व को लेकर सऊदी अरब और ईरान की लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और ईरान द्वारा अरामको रिफाइनरी पर किए गए हमलों के बावजूद रियाद ने अब तक बहुत सतर्कता बरती है। 28 फरवरी को जिस दिन खामेनेई की हत्या हुई थी, वाशिंगटन पोस्ट ने बताया था कि सऊदी क्राउन प्रिंस ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान पर हमले शुरू करने का आग्रह किया था। बंद दरवाजों के पीछे जो कुछ भी हुआ हो, सऊदी अरब ने सार्वजनिक रूप से ईरान संकट के लिए कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है।

क्या है मुस्लिम उम्माह और इसकी भूमिका?

मध्य पूर्व के उन शहरों में जहां व्यापारिक और शांतिपूर्ण माहौल है, आग भड़क रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या अरब देश वास्तव में ईरान के खिलाफ कार्रवाई करेंगे? क्या मुस्लिम उम्माह अरब देशों के संयम का एक कारण है? मुस्लिम उम्माह की भूमिका क्या है? दरअसल, मुस्लिम उम्माह विश्वभर के मुस्लिम राष्ट्रों का सामूहिक समुदाय है, जिसकी अवधारणा कुरान में निहित है। औपनिवेशिक शासन या गैर-मुस्लिम शक्तियों से जुड़े संघर्षों जैसे बाहरी खतरों के समय, मुसलमानों को सामान्य शत्रुओं के विरुद्ध एकजुट करने के लिए उम्माह का आह्वान किया गया है। लेकिन इस मामले में जटिल शिया-सुन्नी विभाजन भी मौजूद है। जहां सभी अरब देशों में सुन्नी आबादी बहुमत में है, वहीं ईरान एक शिया देश है। ईरान के अलावा, इराक, लेबनान और पाकिस्तान में भी अच्छी खासी शिया आबादी है। शिया और सुन्नी में ऐतिहासिक टकराव रहा है और यह बदस्तूर जारी है। पाकिस्तान में अक्सर शिया समुदाय को निशाना बनाया जाता है।

क्यों पलटवार से बच रहे अरब देश?

इस समय, अरब देशों के सामने एक कठिन विकल्प है। अगर वे मुस्लिम उम्माह के किसी हिस्से वाले देश पर जवाबी हमला करते हैं, तो उन्हें न केवल व्यापक इस्लामी समुदाय के खिलाफ कार्रवाई करने वाला माना जाएगा, बल्कि इजरायल के साथ खड़े होने का भी आरोप लगेगा। वह भी एक शिया नेता की हत्या के बाद। ईरान के खिलाफ कार्रवाई को अमेरिका-समर्थक और इजराइल-समर्थक माना जा सकता है। सबसे बड़ा डर यह है कि ईरान पर किसी भी हमले को दुनिया भर के मुसलमान अमेरिका-इजराइल गठबंधन का समर्थन करने वाले देशों के रूप में देखेंगे। अरब देश ऐसा संदेश देने का जोखिम नहीं उठा सकते।

सऊदी अरब दशकों से ईरान को यमन, सीरिया और अन्य क्षेत्रों में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा करने वाला क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है। सऊदी अरब ने तब भी कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि उसके तेल रिफाइनरियों पर ईरानी मिसाइलें गिर रही हैं और उन्हें जला रही हैं। सोमवार को ड्रोन हमले के बाद अरामको तेल रिफाइनरी में लगी आग की तस्वीरें सामने आईं। हालांकि, अभी तक अरब देशों द्वारा ईरान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई न करने का कोई आधिकारिक कारण उपलब्ध नहीं है। उन्होंने खामेनेई की मौत पर ईरान के साथ एकजुटता जताते हुए कोई आधिकारिक बयान भी जारी नहीं किया है, हालांकि रूस और चीन ने अमेरिकी-इजराइली हमलों की निंदा जरूर की है। प्रमुख अरब नेताओं की ओर से स्पष्ट रूप से ईरान का समर्थन करने वाला कोई बयान या पोस्ट सामने नहीं आया है।

ईरान के पलटवार का भी सता रहा डर

दूसरी वजह ये है कि अगर ये देश जवाबी कार्रवाई करते हैं तो ईरान हमलों में और तेजी ला सकता है। ईरान ने यह स्पष्ट भी कर दिया है। ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों के बाहाने सऊदी अरब सहित अन्य अरब देशों के सार्वजनिक जगहों को भी खुलकर निशाना बनाया है। दुबई क एयरपोर्ट और होटल भी ईरान के हमले का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में इन देशों को डर सता रहा है कि जवाबी कार्रवाई उनपर ही भारी पड़ सकती है। फिलहाल ये देश अपना बचाव करने में ही जुटे हैं।

ईरान ने खुद को इस्लामी योद्धा के रूप में पेश किया

इसके अलावा, ईरान ने वर्षों से खुद को पश्चिम के खिलाफ लड़ने वाले एक इस्लामी योद्धा के रूप में पेश किया है। यदि अरब देश उस पर हमला करते हैं, तो तेहरान इस कदम को अन्याय और पश्चिम की गुलामी के रूप में पेश कर सकता है, जिससे उसे पूरे क्षेत्र में सहानुभूति मिल सकती है। अरब देश खास तौर पर सऊदी अरब किसी भी कीमत पर ईरान को यह लाभ नहीं देना चाहेगा। अरब देशों की आधिकारिक स्थिति चाहे जो भी हो, खामेनेई की हत्या को दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा एक इस्लामी नेता की हत्या के रूप में देखा जा रहा है। इसी भावना और ईरान के तेवर के कारण अरब देशों ने तेहरान के हमलों का सामना करने के बावजूद फिलहाल संयम बरतना चुना है।

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