West Bengal Politics

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 : दुर्गापुर पश्चिम विधानसभा सीट से क्या इस बार भी BJP दर्ज करेगी जीत, जानिए क्षेत्र का चुनावी इतिहास

दुर्गापुर पश्चिम पूरी तरह शहरी है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की कुल आबादी करीब 3.40 लाख (दुर्गापुर के संबंधित हिस्से) है, जिसमें ग्रामीण आबादी शून्य है। अनुसूचित जाति (SC) की हिस्सेदारी लगभग 15% और अनुसूचित जनजाति (ST) की मात्र 2.3% है। जिले स्तर पर हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय की महत्वपूर्ण मौजूदगी है, खासकर कुछ वार्डों में है। जातीय रूप से यहां बंगाली हिंदू प्रमुख हैं, लेकिन औद्योगिक शहर होने से बिहार, यूपी और अन्य राज्यों से आए हिंदी भाषी मजदूरों की अच्छी संख्या है।

स्टील सिटी के नाम से जाना जाता है दुर्गापुर
दुर्गापुर को ‘स्टील सिटी’ कहा जाता है। जहां दुर्गापुर स्टील प्लांट और आसपास के उद्योग रोजगार के मुख्य स्रोत हैं। कोयला खदानों, फैक्टरियों और ट्रैफिक से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रहा है। कई इलाकों में पानी की कमी और प्रदूषित जल स्रोत आम शिकायत हैं।

2021 में बीजेपी ने किया बड़ा उलटफेर
दुर्गापुर पश्चिम सीट लंबे समय तक वामपंथी के प्रभाव में रही है। 2011 के बाद टीएमसी और कांग्रेस का दौर आया। 2021 में भाजपा ने यहां बड़ा उलटफेर किया। पिछले तीन बार के चुनावी नतीजों में नजर डाले तो यहां से बीजेपी, कांग्रेस और टीएमसी के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है।

2021 विधानसभा चुनाव के परिणाम
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के लक्ष्मण चंद्र घोरुई ने जीत हासिल की। उन्हें 91,186 वोट (46.31%) मिले, जबकि टीएमसी के बिश्वनाथ परियाल को 76,522 वोट (38.86%) मिले। कांग्रेस के देबेश चक्रवर्ती 18,030 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। भाजपा ने यहां से कांग्रेस को हराकर जीत दर्ज की। यह चुनाव भाजपा के लिए राज्य में बड़े बदलाव का संकेत था।

2016 का विधानसभा चुनाव परिणाम
2016 में कांग्रेस के बिश्वनाथ परियाल ने जीत दर्ज की। उन्हें करीब 46-48% वोट मिले, जबकि टीएमसी और सीपीआई(एम) के उम्मीदवार पीछे रहे। दोनों के बीच मार्जिन अच्छा था। कांग्रेस ने अपनी पकड़ बनाए रखी। मतदान प्रतिशत लगभग 75-78% के आसपास था।

2011 विधानसभा चुनाव परिणाम
टीएमसी के अपूर्बा मुखर्जी ने जीत हासिल की। उन्होंने मजबूत वोट शेयर के साथ सीट पर कब्जा किया। टीएमसी के उम्मीदवार को 92454 वोट मिले थे। इस चुनाव के बाद लेफ्ट फ्रंट का प्रभाव कमजोर हुआ था। 2011 के चुनाव परिणाम में टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन का असर साफ दिखाई दिया था।

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