West Bengal Assembly Election 2026: इस बार विधानसभा चुनावों के लिए टीएमसी ने 74 विधायकों का टिकट काट दिया है। इनमें हावड़ा शिबपुर से विधायक मनोज तिवारी, जोरासांको से विधायक विवेक गुप्ता, मालदा से विधायक कृष्णेंदु नारायण चौधरी, साबित्री मित्रा, रत्ना डे नाग और परेश पाल शामिल हैं। यह टीएमसी का साधारण कदम नहीं है। कालीघाट के सूत्रों का कहना है कि यह कदम सत्ता विरोधी लहर, पिछले खराब प्रदर्शन और स्थानीय स्तर पर चल रही अंदरूनी कलह का मुकाबला करने के लिए उठाया गया है।
West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले टीएमसी ने पहली ही बार में सभी 291 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इसे उनकी एक सोची-समझी रणनीतिक चाल के रूप में देखी जा रहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने इस बार टिकट वितरण में बड़ा बदलाव करते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि वह चुनाव को ‘चेहरों’ के बजाय ‘संगठन’ के दम पर लड़ना चाहती है। पार्टी ने करीब 135 मौजूदा विधायकों को दोबारा मौका देने के साथ लगभग 74 विधायकों का टिकट काट दिया है। साथ ही 15 की सीट बदल दी है। यह इस बात का संकेत है कि पार्टी एंटी-इनकंबेंसी को लेकर सतर्क है और स्थानीय स्तर पर असंतोष को पहले ही नियंत्रित करना चाहती है। इसके अलावा कुछ उम्मीदवारों को सीट बदलकर उतारना भी इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि किसी एक क्षेत्र में लंबे समय से जमा नाराजगी चुनावी नुकसान में न बदले।
एंटी-इनकंबेंसी को सीधे टारगेट
इस बार विधानसभा चुनावों के लिए टीएमसी ने 74 विधायकों का टिकट काट दिया है। इनमें हावड़ा शिबपुर से विधायक मनोज तिवारी, जोरासांको से विधायक विवेक गुप्ता, मालदा से विधायक कृष्णेंदु नारायण चौधरी, साबित्री मित्रा, रत्ना डे नाग और परेश पाल शामिल हैं। यह टीएमसी का साधारण कदम नहीं है। कालीघाट के सूत्रों का कहना है कि यह कदम सत्ता विरोधी लहर, पिछले खराब प्रदर्शन और स्थानीय स्तर पर चल रही अंदरूनी कलह का मुकाबला करने के लिए उठाया गया है। आम तौर पर सत्ताधारी दल अपने मौजूदा चेहरों को बनाए रखने की कोशिश करते हैं ताकि संगठनात्मक स्थिरता बनी रहे। लेकिन टीएमसी ने उल्टा रास्ता अपनाया है। इसका सीधा मतलब है कि पार्टी को एंटी-इनकंबेंसी का खतरा महसूस हो रहा है, खासकर उन इलाकों में जहां स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन खराब रहा, भ्रष्टाचार के आरोप लगे या गुटबाजी बढ़ी।
135 विधायकों को दोबारा मौका
जहां एक ओर बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ, वहीं 135 विधायकों को दोबारा टिकट देना यह दिखाता है कि TMC पूरी तरह जोखिम नहीं ले रही। यह संतुलन इसलिए जरूरी है क्योंकि संगठन का कोर स्ट्रक्चर बना रहे, अनुभवी चेहरे चुनावी मशीनरी को संभालें और वोटर बेस में भरोसा बना रहे। इस तरह यह कह सकते हैं कि पार्टी ने change with continuity का फॉर्मूला अपनाया है।
नए चेहरों की एंट्री
देबांग्शु भट्टाचार्य, कुणाल घोष, रिताब्रत बनर्जी जैसे नए चेहरों को टिकट देना सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म कैडर बिल्डिंग का संकेत है। इससे दो फायदे हैं, युवा और शहरी वोटर्स को आकर्षित करना और पार्टी के भीतर नई नेतृत्व पीढ़ी तैयार करना। इसके अलावा, टीएमसी ने इस बार सेलिब्रिटी पॉलिटिक्स से दूरी बनाते हुए संगठन पर फोकस किया है। पार्टी यह मान रही है कि सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि बूथ मैनेजमेंट चुनाव जिताता है।
राजनीतिक पकड़ और नेतृत्व की विश्वसनीयता बनाए रखने की कसौटी
दूसरी ओर, पार्टी ने जिन वरिष्ठ और विवादित चेहरों के टिकट काटे हैं, वह यह भी दर्शाता है कि भ्रष्टाचार या नकारात्मक छवि से दूरी बनाकर वह जनता के बीच नई शुरुआत का संदेश देना चाहती है। साथ ही, सीमित लेकिन संतुलित तरीके से खिलाड़ियों और पेशेवर चेहरों को शामिल कर पार्टी ने यह संकेत भी दिया है कि वह विविधता बनाए रखते हुए नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहती है। कुल मिलाकर टीएमसी का यह दांव “ग्राउंड कनेक्ट बनाम स्टार पावर” की राजनीति को आगे बढ़ाता है, जहां चुनावी जीत का आधार संगठन, स्थानीय नेटवर्क और मतदाता से सीधा संवाद बन रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह रणनीति पार्टी को लगातार चौथी बार सत्ता तक पहुंचा पाती है या भाजपा इस मॉडल को चुनौती देने में सफल होती है।
महिलाओं और सामाजिक समूहों पर फोकस
इसके अलावा, टीएमसी की 291 उम्मीदवारों की लिस्ट में 52 महिला उम्मीदवार भी शामिल हैं। इसके अलावा, टिकट पाने वालों में अनुसूचित जाति के 78, अनुसूचित जनजाति के 17 और अल्पसंख्यक समुदायों के 47 उम्मीदवार शामिल हैं। ऐसे में महिलाओं को को टिकट देना और SC, ST व अल्पसंख्यक समुदायों को व्यापक प्रतिनिधित्व देना TMC की सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने की कोशिश है। अपनी इस रणनीति के जरिए टीएमसी तीनों वर्गों में पकड़ मजबूत करना चाहती है
टीएमसी के सामने जोखिम क्या हैं?
इतने बड़े पैमाने पर बदलाव के अपने खतरे भी हैं। टिकट कटने वाले नेता बगावत कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर संगठन कमजोर हो सकता है। इसके आलावा नए उम्मीदवारों को जमीनी नेटवर्क बनाने में समय लग सकता है। खासतौर पर बंगाल जैसे राज्य में, जहां स्थानीय नेटवर्क और बूथ मैनेजमेंट बेहद अहम होता है, यह एक बड़ा दांव है।

