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यूपी में केजीएमयू से मजार हटाने के मामले ने पकड़ा तूल, औवेसी की AIMIM ने दी आंदोलन की चेतावनी

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज स्थित मजार को हटाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. मुस्लिम संगठनों ने जहां इस पर ऐतराज जताया है, तो वहीं अब ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसिल्मीन (AIMIM) भी इसमें कूद पड़ी है.

AIMIM के यूपी सेंट्रल अध्यक्ष शेख ताहिर सिद्दीकी ने इसको लेकर एक प्रेसवार्ता आयोजित की. जिसमें उन्होंने कहा, “केजीएमयू परिसर में स्थित मजारात को अवैध बताकर गलत सूचना के आधार पर भ्रामक व असत्य तथ्यों पर आधारित मजारात पर नोटिस चस्पा की गई है. केजीएमयू द्वारा दी गई नोटिस में कहा गया 15 दिवस में दरगाह को हटा दें जो कि विधि विरुद्ध निर्देश दिया गया है.”

ताहिर सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि आजादी से पहले की मजारें KGMU में स्थित हैं, कभी उन्हें अवैध नहीं ठहराया गया. लेकिन अब लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है. जो पूरी तरह गलत है.

अंगेजों के जमाने से दरगाह होने का दावा
सिद्दीकी ने कहा कि सभी मजारें/दरगाह अंग्रेजी शासन काल के पहले से ही स्थापित थीं. कभी भी परिसर में स्थित दरगाहों को अवैध नहीं कहा गया. केजीएमयू के स्थापना एवं बनने से पहले से ही सभी दरगाहे मौजूद थी. उस समय मौजूद मजार/दरगाह को केजीएमयू बनते समय इसलिए छोड़ दिया गया था, क्योंकि दरगाहें प्राचीन काल की सैकड़ों साल पुरानी एवं वैध थी. अब नोटिस देना बिल्कुल गैरकानूनी है मजार पर मुस्लिम हिंदू व अन्य धर्म के लोग अपनी अकीदत रखते हैं. अपनी धार्मिक रीति रिवाज क्रियाकलाप करते रहते हैं.

नोटिस का कोई कानूनी महत्व नहीं
शेख ताहिर सिद्दीकी ने कहा कि मजार सैकड़ो वर्षों पुरानी है. जिनकी देखरेख आदि धार्मिक प्रथा के अनुसार स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता रहा है, जो कि संवैधानिक अधिकार रहा है. जैसा कि भारतीय संविधान की अनुच्छेद 25 में प्रावधानित है. हमारे भारतवर्ष में अनेक लोक संस्थानों में धार्मिक संस्थाएं पूजा स्थल स्थापित है, जिनसे कभी भी आम जनमानस को कोई भी आपत्ति नहीं रही न ही किसी के द्वारा कोई शांति व्यवस्था भंग किए जाने की शिकायत रही. केजीएमयू द्वारा लगाई गई नोटिस का कोई भी कानूनी अस्तित्व नहीं है. चस्पा की गई नोटिस का कोई भी विधि के मुताबिक अस्तित्व नहीं है.

उक्त नोटिस उपासना स्थल अधिनियम 1991 के प्राविधानों के विपरीत है. जैसा कि अधिनियम की धारा 4(1) में यह प्राविधानित किया गया है कि 15 अगस्त 1947 की विद्यमान किसी पूजा स्थल धार्मिक स्ट्रक्चर का धार्मिक स्वरूप उस दिन के स्वरूप सामान बना रहेगा. इसलिए केजीएमयू द्वारा दी गई नोटिस संविधान एवं कानून विरुद्ध है. नोटिस चस्पा करके धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाया गया है जबकि मजारात आपसी सौहार्द प्रेम भाईचारे एकता का प्रतीक है.

आंदोलन की दी चेतावनी
सिद्दीकी ने कहा कि किसी भी तरह से मजारात को अवैध बताकर तोड़ने का प्रयास किया गया तो यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्राप्त अधिकारों के हिसाब से AIMIM आंदोलन करने पर मजबूर होगी. जिसकी समस्त जिम्मेदारी केजीएमयू प्रशासन एवं शासन की होगी.

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