प्रयागराज शहर के अंदर चलने वाले छोटे वाहन ई-रिक्शा और ऑटो चालकों की मनमानी देखी जा रही है. संगम तट पर महात्मा भी इससे अछूते नहीं हैं. ऐसा वे लोग बता रहे हैं, जो महाकुंभ से लौटकर दरभंगा आए हैं और उन्होंने सारी जानकारी दी है.
कई सालों के बाद एक अद्भुत संयोग में होने वाले महाकुंभ स्नान को लेकर प्रयागराज जिले के संगम तट पर लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही है.
स्थिति ऐसी बनी हुई है कि कई किलोमीटर तक वाहनों का लंबा जाम लगा हुआ है और संगम तट पर स्नान के लिए कई किलोमीटर तक लोगों को पैदल चलना पड़ रहा है. इस दौरान प्रयागराज शहर के अंदर चलने वाले छोटे वाहन ई-रिक्शा और ऑटो चालकों की मनमानी देखी जा रही है. संगम तट पर महात्मा भी इससे अछूते नहीं हैं.
ऐसा ना तो कोई बनावटी कहानी है और ना ही काल्पनिक बातें हैं. दरअसल ऐसा वे लोग बता रहे हैं, जो महाकुंभ से लौटकर दरभंगा आए हैं और जिन्होंने Nvr24 से दरभंगा से महाकुंभ की यात्रा का अनुभव शेयर किया है.
अपनी यात्रा की बताई पूरी कहानी
दरभंगा जिले के देकुली निवासी मनोज झा अपनी बूढ़ी मां और पत्नी के साथ महाकुंभ स्नान के लिए 10 जनवरी को ट्रेन से दरभंगा से प्रयागराज के लिए निकले थे. मनोज बताते हैं कि सबसे पहले तो जैसे-तैसे दरभंगा में ट्रेन पर चढ़ गए. किसी तरह मां को उनकी सीट पर बिठा सका, लेकिन ना तो खुद अपनी सीट पर बैठ सका और ना ही पत्नी को सीट नसीब हो पाया. जैसे-तैसे प्रयागराज छोउकी स्टेशन पहुंच गए. वहां उतारने के बाद मुझे ऑटो लेना था. वहां ऑटो चालकों के द्वारा बारगेनिंग किया जा रहा था. हम लोगों से संगम घाट तक पहुंचाने का 1500 रुपए लिया गया. लेकिन संगम घाट तक ना पहुंचाकर पीपा पुल के इस तरफ ही नाग बांसुकी मंदिर है, वहां पर ले जाकर छोड़ दिया.
उसके बाद वहां से सेक्टर 19 हमे आना था. एक भी ई- रिक्शा वाले से पूछते थे, तो 200, 300, 400, 500 रुपए तक बासुकीनाथ मंदिर से पीपा पुल क्रॉस करके संगम 18 का मांग रहे थे, जो बहुत ही ज्यादा था. वहां हम लोग तीन दिन रहे. उस दौरान जब एक दिन पैदल जाने का मौका मिला, तो जहां हम लोग रुके हुए थे सेक्टर 19 में, वहां से बासुकीनाथ मंदिर मात्र ढाई किलोमीटर था और इतनी कम दूरी का 500 रुपए ई- रिक्शा वाले का किराया मांगना यह कहीं से भी उचित नहीं था. वहां सरकार को इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि कोई भी श्रद्धालु लूटे नहीं, सरकार को चाहिए था कि मेला क्षेत्र के लिए एक दर किराया निर्धारित होना चाहिए.
कुटिया में रहने के लिए भी देने पड़े पैसे
वहां एक कुटी में हम लोग ठहरे हुए थे, तो महात्माओं का भी खेल वहां बहुत निराला था. जब हम लोग वहां सुबह में पहुंचे, तो महात्मा जी बोले कि ठीक है आप लोगों को कुटी मिल जाएगा. पहले आप लोग स्नान करके आ जाइए. हम लोग जब स्नान करके आए, तो महात्मा बोले कि अब यहां जगह नहीं मिलेगा. फिर उसके बाद जब उनसे बात किए, तो उन्होंने कहा कि जगह मिलेगा, लेकिन जगह लीजिएगा तो 15000 रुपए देना होगा. फिर हम लोगों ने मजबूरन 15000 रुपए देकर वहां पर किसी तरह अपने रहने के लिए कुटी लिया. वहां 1 किलोमीटर भी कहीं जाते थे, तो 100 रुपए से कम कोई भी ई- रिक्शा का किराया नहीं लेता था.
खाने के लिए हम लोगों ने खुद से गैस-सिलेंडर की सारी व्यवस्था की और खुद से बनाकर वहां खाए. वहां 80 रुपए में किसी भी होटल में खाते हैं, तो भरपेट खाना खिलाते हैं, यह अच्छी व्यवस्था थी. एक और दिक्कत वहां पर थी कि वहां किसी पुलिस प्रशासन को सेक्टर का कोई भी अनुभव नहीं था. यदि हम लोग वहां पूछते भी थे कि इस सेक्टर में हमको जाना है, तो पुलिस प्रशासन भी सही से नहीं बता पा रही थी. उन्हें भी रूट चार्ट नहीं मिला था, वह सही से जानकारी लोगों को नहीं दे पा रहे थे.

