Kerala Assembly Election Result: केरल की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां आज होने वाली मतगणना न केवल अगले पांच सालों का भविष्य तय करेगी, बल्कि कई बड़े राजनीतिक दिग्गजों के भाग्य का फैसला भी करेगी। राज्य में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय रहा है, लेकिन मुख्य लड़ाई सत्ताधारी एलडीएफ (LDF) और विपक्षी यूडीएफ (UDF) के बीच मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि यदि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में आता है तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा? क्या पार्टी किसी अनुभवी विधायक पर भरोसा जताएगी या फिर दिल्ली की राजनीति में सक्रिय किसी बड़े चेहरे को राज्य की कमान सौंपकर सबको चौंका देगी? विशेष रूप से शशि थरूर के नाम को लेकर चल रही चर्चाओं ने इस चुनावी सरगर्मी को और भी दिलचस्प बना दिया है।
मुख्यमंत्री के चेहरे पर शशि थरूर का रुख
तिरुवनंतपुरम में पत्रकारों से बात करते हुए जब कांग्रेस सांसद शशि थरूर से सीधा सवाल पूछा गया कि क्या कोई सांसद (MP) केरल का मुख्यमंत्री बन सकता है तो उन्होंने बहुत ही चतुराई और स्पष्टता से जवाब दिया। थरूर ने कहा, ‘मैं अच्छी तरह जानता हूं कि आप मुझसे क्या कहलवाना चाहते हैं, लेकिन मैं वैसा कुछ नहीं कहने वाला। इसका उत्तर बहुत स्पष्ट है। कांग्रेस पार्टी में हमारी एक मानक प्रक्रिया है। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी अध्यक्ष का एक प्रतिनिधि नवनिर्वाचित विधायकों से मिलता है। वह व्यक्ति विधायकों की राय और पसंद को समझता है। इसके बाद वह दिल्ली जाकर आलाकमान को रिपोर्ट देता है। आलाकमान उन सभी सुझावों को ध्यान में रखते हुए अंतिम फैसला करता है। इसके बाद वे किसी भी नियम या सीमा से बंधे नहीं होते, वे जो चाहें चुन सकते हैं। यह पूरी तरह उन पर निर्भर करता है।’ थरूर के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मुख्यमंत्री के चयन का विकल्प खुला है और आलाकमान भविष्य की जरूरतों को देखते हुए कोई भी बड़ा फैसला ले सकता है।
एग्जिट पोल और जमीनी हकीकत
कल होने वाली मतगणना से पहले एग्जिट पोल के अनुमानों पर टिप्पणी करते हुए थरूर ने कहा कि हालांकि हमारे देश में एग्जिट पोल हमेशा सटीक नहीं होते, लेकिन इस बार सभी का एकमत होना चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा, ‘मुझे विशेष रूप से एग्जिट पोल पर भरोसा करना पसंद नहीं है, क्योंकि उनमें कई समस्याएं होती हैं, लेकिन इस बार यह अद्भुत है कि सभी एक ही बात कह रहे हैं। एक सर्वसम्मत निष्कर्ष सामने आया है। सच कहूं तो 4 अप्रैल के बाद से मैंने जिन भी विशेषज्ञों पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों से बात की है, वे सभी इस बात पर एकमत हैं कि यह यूडीएफ की जीत होने जा रही है। अगर परिणाम ऐसे नहीं रहे तो यह वास्तव में आश्चर्यजनक होगा।’
वामपंथ के लिए ऐतिहासिक संकट
थरूर ने इस चुनाव के राष्ट्रीय महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि एलडीएफ हारती है तो यह भारतीय राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना होगी। उनके शब्दों में, ‘4 मई की सबसे बड़ी खबर यह होगी कि 1960 के दशक के बाद पहली बार ऐसा होगा जब वामपंथी दल (LDF) देश के किसी भी राज्य की सत्ता में नहीं होंगे। 2011 में जब हम जीते थे तब वे केरल और बंगाल दोनों हार गए थे, लेकिन तब भी त्रिपुरा में उनकी सरकार थी। लेकिन इस बार वे पूरे भारत में कहीं भी सत्ता में नहीं रहेंगे और यह हमारे देश के लिए एक बहुत बड़ा घटनाक्रम होगा।’
केरल में क्या हैं चुनावी समीकरण?
बता दें, केरल में इस बार मुकाबला दिलचस्प है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट इस बार भी कांग्रेस के नेतृत्व यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को कड़ी चुनौती दे रहा है। अगर इस बार लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की वापसी होती है तो ये LDF तीसरी बार सरकार बनाएगा और पिनारई विजयन तीसरी बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं। वहीं दूसरी ओर यूडीएफ भी इस बार मजबूत स्थिति में हैं। केरल का इतिहास भी रहा है कि वहां की जनता किसी भी पार्टी को दूसरा मौका जल्द नहीं देती, लेकिन पिछली बार एलडीएफ की दूसरी बार वापसी हुई थी। ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या केरल की जनता बदलाव को चुनती है या फिर कांग्रेस का रुख करती है।

