कांग्रेस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को महंगाई के खिलाफ हल्ला बोल रैली की। रैली में राहुल ने महंगाई के साथ ही मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा। राहुल ने इस दौरान जो कहा उससे साल 2024 में एनडीए विशेष रूप से मोदी के खिलाफ लामबंदी कर रहे नेताओं को झटका लग सकता है। विपक्ष पीएम मोदी के चेहरे के जवाब में एक चेहरे पर सहमत होगा फिलहाल ऐसा नहीं जान पड़ रहा है। इस बीच कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल के बयान के भी दूरगामी जनीतिक निहितार्थ निकल रहे हैं। राहुल ने रामलीला मैदान से कहा कि केवल कांग्रेस ही देश बचा सकती है। इससे एक बात तो साफ है कि राहुल की इस बात में ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, केसीआर समेत तमाम विपक्षी नेताओं के लिए संदेश छिपा है। कांग्रेस खुद को क्षेत्रीय दलों से अधिक तरजीह दे रही है। किसी भी अंतिम नतीजे पर पहुंचने से पहले सबसे पुरानी पार्टी के नेता राहुल गांधी के बयान का संदर्भ भी जान लेते हैं।
कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता ही देश बचाएगा
राहुल गांधी ने हल्ला बोल रैली के मंच से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जिक्र करते हुए कहा कि आप हमारी विचारधारा के लिए लड़ते हो, आप हिंदुस्तान के लिए लड़ते हो, आप संविधान के लिए लड़ते हो। कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता ही देश को बचा सकता है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस पार्टी देश को जोड़ती है, हम नफरत मिटाते हैं और जब नफरत मिटती है, डर कम होता है, तब देश आगे बढ़ता है। राहुल ने कहा कि लोगों के चेहरों पर फैला यह उत्साह, उस उम्मीद और विश्वास की देन है जो उसे कांग्रेस ने दिया है। उन्होंने कहा कि यह विश्वास, यह उम्मीद ही हमारी ताकत है। इसके बूते हम अन्यायी तानाशाहों का घमंड तोड़, एक नए और बेहतर कल की शुरुआत करेंगे।
केंद्र में क्षेत्रीय दलों को हावी नहीं होने देगी कांग्रेस
रैली में राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर हमला करते हुए यूपीए सरकार की उपलब्धियों को गिनाया। राहुल ने मनरेगा, भोजन का अधिकार, कर्ज माफी जैसे योजनाओं का भी जिक्र किया। राहुल ने कहाकि हमने 10 साल में 27 करोड़ लोगों को गरीबी से निकाला। ऐसे में राहुल यूपीए सरकार के दौरान कांग्रेस की भूमिका का जिस तरह से जिक्र किया, उससे नहीं लगता कि कांग्रेस किसी क्षेत्रीय दलों के गठजोड़ में छोटे भाई की भूमिका में रहेगी। राहुल का बयान इस बात का साफ संदेश दे रहा है। हालांकि, चूंकि रैली कांग्रेस की है तो इसमें राहुल की तरफ से पार्टी का यशगान करना भी स्वाभाविक ही है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस भले ही केंद्र पूरे देश से महज दो राज्यों में सरकार तक सिमट कर रह गई है लेकिन उसे अभी अपने राष्ट्रीय पार्टी होने का गुमान है। ऐसे में पार्टी चाहेगी कि क्षेत्रीय दल उस पर किसी भी तरह से केंद्र की भूमिका में हावी ना हो पाएं।
विपक्ष में चेहरे की लड़ाई एकता की धार कुंद कर देगी
विपक्षी दलों में आज कल संयुक्त विपक्ष और विपक्षी नेताओं की गोलबंदी का दौर देखने को मिल रहा है। इस गेम में तेलंगाना की सीएम के. चंद्रशेखर राव आजकल अगुवा बने हुए हैं। केसीआर आजकल तेलंगाना में कम बिहार से लेकर महाराष्ट्र और दिल्ली में देखे जा रहे हैं। केसीआर की एनसीपी प्रमुख शरद पवार से लेकर बिहार के सीएम नीतीश कुमार से मुलाकात 2024 के लिए विपक्षी एकजुटता की कवायद को दर्शाती है। हाल ही में बिहार पहुंचे केसीआर ने पीएम पद के लिए किसी भी चेहरे का नाम नहीं लिया। संभव है कि यदि वह नीतीश कुमार का नाम परोक्ष रूप से भी लेते तो यह विपक्षी एकजुटता की कवायद को शुरू होने से पहले ही कमजोर कर देता।
नीतीश पोस्टर के जरिये कर रहे दावेदारी
दूसरी तरफ ‘सुशासन बाबू’ की छवि वाले नीतीश कुमार ने दिल्ली की दौड़ तेज कर दी है। नीतीश कुमार के पटना जिस तरह से पोस्टर लग रहे हैं, उससे जदयू तो यह संदेश दे रही है कि 2024 में मोदी बनाम नीतीश की ही लड़ाई होने वाली है। ‘बिहार में दिखा, देश में दिखेगा’ पोस्टर से लगता है कि जेडीयू नीतीश को राष्ट्रीय फलक पर उतारने की तैयारी में जुट गई है। नीतीश कुमार यह दावा कर चुके हैं कि 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 50 सीटों पर समेट देंगे। मुख्यमंत्री ने का कहना है कि विपक्ष को एकजुट करने कई कोशिश की जा रही है। अगर सभी विपक्षी दल मिलकर चुनाव लड़ें तो बीजेपी को 50 सीटों पर समेटा जा सकता है। नीतीश कह चुके हैं कि वह इसी अभियान में लगे हैं।
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ममता का कांग्रेस के लिए ‘यस मैडम’ कहेंगी
ममता और सोनिया गांधी के बीच सार्वजनिक मंच पर भले ही गर्मजोशी दिखती है लेकिन केंद्र की भूमिका में ममता कांग्रेस के नेतृत्व में काम करने के लिए तैयार होंगी। पश्चिम बंगाल में दोनों दलों में किस तरह से तलवारें खिंची रहती हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। कांग्रेस नेता और सांसद अधीर रंजन चौधरी तो लोकसभा में ममता की पार्टी पर हमला करने का कोई मौका ही नहीं छोड़ते हैं। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी कांग्रेस के लिए ‘यस मैडम’ कहेंगी, यह बड़ा सवाल है।
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शरद पवार को नकारना होगा मुश्किल
विपक्षी और क्षेत्रीय दलों के नेताओं में शरद पवार एक बड़ा नाम है। शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेश मूल के मुद्दे पर अलग पार्टी बना ली थी। हालांकि, उस समय से लेकर अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। शरद यादव फिलहाल कांग्रेस के साथ महाअघाड़ी सरकार का हिस्सा रह चुके हैं। सोनिया गांधी से उनकी तल्खी अब पहले जैसे नहीं है। शरद यादव की काबिलियत पर खुद कांग्रेस की मौजूदा अध्यक्षा भी सवाल नहीं उठा सकती हैं। राजीव गांधी के बाद ऐसा मौका भी आया जब शरद यादव पीएम बनते-बनते रह गए। ऐसे में यदि विपक्ष एकजुट होता है तो शरद यादव के नाम को नकारना भी मुश्किल होगा। हालांकि, राहुल के बयान से शरद पवार की भी संभावनाएं फिलहाल तो धुंधली ही दिखाई दे रही हैं।
Story of Indira Gandhi Arrest in 1978 : इंदिरा गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री 1977 में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। देश में विरोधी दलों के नेताओं के साथ-साथ पत्रकार और सिविल सोसाइटी के लोग भी पकड़-पकड़कर जेल भेजे गए थे। गुलाम नबी आजाद ने उस घटना का जिक्र करते हुए आज के कांग्रेस नेताओं पर बड़ा तंज कसा है।
कांग्रेस छोड़ अलग पार्टी बनाने का ऐलान कर चुके दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने अपनी पहली रैली में इंदिरा गांधी से जुड़ी एक घटना का जिक्र करके बहुत बड़ी बात कह डाली। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी के नेता शाही मिजाज के हो गए हैं जिसके कारण पार्टी का पतन हो रहा है। उन्होंने 1978 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी का विरोध करने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था जहां उन्हें काफी कठिनयां झेलनी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि आज कांग्रेस नेता धरना-प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार होते हैं तो तुरंत पुलिस के पास पैरवी होने लगती है। आजाद ने तंज और आरोपों की शक्ल में ही सही लेकिन कांग्रेस पार्टी के लिए बड़ी सीख दे दी है।
गुलाम नबी आजाद ने किया इंदिरा की गिरफ्तारी का जिक्र
आजाद ने 1978 में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए कहा कि तब की कांग्रेस और अब की कांग्रेस में आसमान-जमीन का फर्क है। उन्होंने कहा कि तब कांग्रेसी जमीन पर काम करते थे, आज के नेता ट्वीट और एसमएमस से ही काम चला रहे हैं। उन्होंने तंज में कहा भी, ‘हमें जमीन नसीब हो, उन्हें ट्वीट।’
उन्होंने कहा, ‘मैं ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस का महासचिव था जब इंदिरा गांधी को 20 दिसंबर 1988 को संसद से बर्खास्त करके उन्हें सीधा तिहाड़ जेल ले गए। तब मैंने दिल्ली के यूथ कांग्रेस के 5 हजार लड़कों को जुटाकर दिल्ली की जामा मस्जिद से संसद की तरफ बढ़ा, लेकिन रास्ते में हम सबको गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेज दिया। इंदिरा गांधी तो एक-दो हफ्ते में छूट गईं, लेकिन हमें अगले साल जनवरी में छोड़ा। वो जमानत चाहते थे, हमने जमानत नहीं ली थी।’ दरअसल, आजाद 20 दिसंबर 1988 नहीं 19 दिसंबर 1978 की बात कर रहे थे।
आखिर 19 दिसंबर 1978 को क्या हुआ था?
आजाद ने जिस घटना का जिक्र किया, दरअसल वो इंदिरा गांधी की संसद से हुई गिरफ्तारी की है। 1977 के आपातकाल के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी को जीत मिली और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। नई सरकार में इंदिरा गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग उठी। सरकार पर दबाव था कि आपातकाल लगाने के लिए इंदिरा गांधी को सबक सिखाया जाए। तब 19 दिसंबर 1978 को इंदिरा गांधी को लोकसभा से निलंबित कर दिया करके गिरफ्तार किए जाने का प्रस्ताव पारित हुआ। हालांकि, इंदिरा सदन से टस-से-मस नहीं हुईं। आखिरकार रात में लोकसभा अध्यक्ष ने गिरफ्तारी का आदेश जारी किया। स्पीकर के आदेश पर तत्कालीन सीबीआई ऑफिसर एनके सिंह संसद भवन पहुंचे। तब इंदिरा ने बिना ना-नुकुर संसद भवन के उसी दरवाजे से निकलीं जिससे वो बतौर प्रधानमंत्री निकला करती थीं। उन्हें गिरफ्तार करके सीधे तिहाड़ जेल ले जाया गया जहां उन्हें सात दिन रखा गया। इंदिरा जब 1980 में फिर से प्रधानमंत्री बनीं तो एनके सिंह को सीबीआई से निकाल दिया गया।
आजाद का आरोप- अब शाही मिजाज में जी रहे कांग्रेसी
बरहाल, आजाद ने बताया कि जेल में तब किन मुश्किलों की सामना करना पड़ता था। उन्होंने कहा, ‘एक कंबल से सीमेंट के फर्श पर सोकर रात काटते थे। आधी कंबल फर्श पर बिछाते थे और आधी ओढ़ते थे, उस कड़कड़ाती ठंड में। खाने के लिए दो चपाती और दाल मिलती थी। हमने और कंबल की मांग की तो बताया गया कि जेल की क्षमता 8 हजार है और यहां 1 लाख कैदी हैं तो सबके लिए कहां से कंबल लाएंगे और कहां से खाना लाएं।’ उन्होंने अपने ऊपर लग रहे आरोपों का भी जवाब दिया। आजाद बोले, ‘कांग्रेस हमने बनाई, अपने खून-पसीने से बनाई है। यह कंप्यूटर से नहीं बनी, यह ट्वीट से नहीं बनी, यह एसएमएस से नहीं बनी। जो हमें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी अप्रोच कंप्यूटर, मोबाइल तक है, हमारी अप्रोच जमीन पर है। इसलिए अल्लाह से दुआ करता हूं- हमें जमीन नसीब करे, उन्हें ट्वीट नसीब करे। वो ट्वीट में खुश रहें और हम अपने भाइयों के साथ सड़कों, खेतों-खलिहानों में मेहनत-मजदूरी करें। हमारी जिंदगी और हम अपने उन्हीं गरीब भाइयों के साथ दफन हो जाएं, उन्हें उनकी शहंशाही मुबारक।’
जम्मू में आयोजित एक रैली में आजाद ने कहा कि आज के कांग्रेस नेता सारा आंदोलन सोशल मीडिया पर चलाना चाहते हैं, जमीन पर उतरना कोई नहीं चाहता। उन्होंने कहा कि एक वक्त था जब कांग्रेस के आम नेता और कार्यकर्ता ही नहीं, बड़े-बड़े पदाधिकारी और केंद्रीय मंत्री तक जमीन पर संघर्ष करते थे। उन्होंने कहा, ‘मैं हमेशा जमीन से जुड़ा रहा हूं। मैं हिंदुस्तान के जिस भी राज्य का प्रभारी रहा, मैं कभी वहां के शहरों में नहीं रहा। कांग्रेस महासचिव और केंद्र सरकार के मंत्री के तौर पर हमेशा देहातों-गांवों में वहां के सरपंचों के यहां रहा करता था।’

