लोकसभा चुनाव के पहले युवाओं को रोजगार के बहाने सीएम नीतीश कुमार की ओर से चुनावी तीर चलाए जा रहे हैं। चुनाव के पहले राज्य में 4.65 लाख शिक्षक दूत तैयार हो चुके है, जबकि जीविका दीदी की बड़ी फौज खड़ी हो गई। इसके अलावा मानदेय बढ़ोतरी के कारण मुखिया, उप मुखिया, वार्ड सदस्य, सरपंच, उप सरपंच और आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं का भी समर्थन बढ़ा है।
यह महज संयोग कह ले या फिर महागठबंधन सरकार की चली राजनीतिक चाल, पर जाने-अनजाने महागठबंधन के समर्थन में लाभार्थियों की फौज तो खड़ी होते दिखती है। अमूमन इस तरफ के आयोजनों का तात्कालिक चुनावी लाभ तो वर्तमान सरकार को मिलता है। लेकिन इतना तो तय है कि विपक्ष के लिए डैमेज कंट्रोल करना आसान नहीं होगा।
शिक्षकों की फौज और महागठबंधन की सरकार
यूं तो बिहार की राजनीतिक बिसात पर हर आए दिन लाभार्थियों के मोहरे बिछाए जा रहे है। 13 जनवरी को गांधी मैदान में भी शिक्षकों की नियुक्ति के जरिए एक बड़ी संख्या में चुनावी दूत तैयार होते दिखे। 96 हजार शिक्षकों को नियुक्ति पत्र दे कर सरकार ने विपक्ष के आगे सरकार के समर्थकों की एक बड़ी फौज तो खड़ी तो कर ही दी। पर नीतीश कुमार यही नहीं रुके अपने संबोधन को राजनीति के हवाले करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो करोड़ नौकरी देने के वादा पर कटाक्ष करते कहा कि वे लगभग 5 लाख नौकरी और 5 लाख लोगों को रोजगार दे चुके हैं। अभी बहुत बहाली करनी है। जरूरत पड़ी तो 10 लाख से अधिक नौजवानों की बहाली करेंगे। वे काम करते हैं दुष्प्रचार नहीं करते।
शिक्षकों की फौज विपक्ष पर पड सकते हैं भारी
सीएम नीतीश कुमार ने पहले चरण में लगभग 3 लाख 68 हजार नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति दी थी। और अब 96 हजार यानी अपरोक्ष रूप से 4 लाख 64 हजार चुनावी दूत तैयार हो चुके हैं। जीविका दीदी की फौज इसके पहले ही तैयार हो चुकी थी। इनके बढ़े मानदेय और हड़ताल अवधि में चयनमुक्त आंगनबाड़ी सेविकाएं और सहायिकाओं के पुनः बहाली ने इनके भीतर सरकार के प्रति विश्वास तो जगा ही गया। और फिर मुखिया, उप मुखिया, वार्ड सदस्यों तथा सरपंच, उप सरपंच और पंचों के के मानदेय में सम्मानजनक वृद्धि कर महागठबंधन ने ग्रास रूट पर चुनावी दूत की बड़ी फौज तो खड़ा कर दी।
चुनाव के पहले रोजगार देना हर सरकार की कोशिश
वरिष्ठ पत्रकार बन्धु कहते हैं चुनाव के समय लाभार्थियों की फौज खड़ा करने वाले नीतीश कुमार कोई पहले मुख्यमंत्री नहीं। सरकार तो कुछ मुद्दों को सिर्फ इसलिए लटका कर रखती है कि चुनाव के समय जब एक खास वर्ग की मांग पूरी होगी तो उनकी निष्ठा सरकार की तरफ बढ़ेगी। राम मंदिर उद्घाटन पर भी तो राजनीति का ठप्पा लग रहा है। विपक्ष तो यह कह ही रहा चुनाव के समय उद्घाटन का कार्यक्रम रखा गया है। यह पहले या बाद में भी हो सकता है। अब तो जनमानस भी यह मान चुका है उनकी मांग चुनाव के नजदीक आने पर पूरी होगी। अब नीतीश कुमार ने शिक्षको को राज्यकर्मी का दर्जा दे कर भी तो सियासत ही की है।

