उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले सियासी दल अगले कुछ महीनों में महापुरुषों की आने वाली जयंतियों और पुण्यतिथियों पर चर्चे, पर्चे और खर्चे का प्लान बना चुके हैं. भले ही महापुरुष की विचारधारा से उनकी सियासी धारा मेल खाती हो या नहीं, सबकी अपनी रणनीतियां बन रहीं हैं.
बीते दिनों कांशीराम की जयंती पर यह दिखा कि कैसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, समाजवादी पार्टी ने अपने-अपने आयोजन किए. भारतीय जनता पार्टी ने भी उनके सम्मान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. बामसेफ और फिर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक रहे कांशीराम की विरासत में बहुजन समाज पार्टी का अपना ही दावा है.
सभी ने एक दूसरे पर आरोप लगाए कि दलित मतों को अपनी ओर खींचने के लिए सब अपने-अपने दावे कर रहे हैं. कांग्रेस और सपा ने जहां कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग की तो वहीं बसपा ने कहा है कि जब अपनी सरकार थी, तब कांग्रेस ने ऐसा क्यों नहीं सोचा. वहीं बीजेपी ने कहा कि अपनी सरकार में अपमान करने वाले अब वोट के लिए भारत रत्न की मांग कर रहे हैं.
अब बाबा साहेब की जयंती की तैयारी
इन सबके बीच अब बारी है बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल को है. इसके लिए बसपा ने सभी कार्यकर्ताओं को लखनऊ बुलाया है. वहीं समाजवादी पार्टी भी अलग आयोजन की योजना बना रही है. उधर, कांग्रेस ने भी जिलों और राजधानी में कार्यक्रम की प्लानिंग कर ली है. इन सबके बीच राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 7 अप्रैल को कैबिनेट बैठक में सभी 403 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में बाबा साहेब की प्रतिमा को उचित सम्मान देने के क्रम में 403 करोड़ रुपये आवंटित करने का फैसला किया है.
इस कड़ी में भी बसपा सबसे आगे दिखती है. बसपा खुद को बाबा साहेब की वैचारिक विरासत का नैसर्गिक अधिकारी मानती है. हालांकि जिन मतों को बसपा कभी अपना ही मान कर चल रही थी, अब वह भी कई खेमों में बंट चुके हैं. विधानसभा चुनावों में दावा किया जाता है कि दलित वोटर्स, बीजेपी के साथ जाते हैं तो वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में दावा किया गया कि दलित मत सपा और कांग्रेस के इंडिया अलायंस की ओर गए.
बीजेपी की रणनीति कैसे होगी सफल?
भारतीय जनता पार्टी दलित वोट बैंक को स्थायी रूप से अपने पक्ष में लाने के लिए प्रतीक और विकास मॉडल पर काम कर रही है. डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर मूर्ति विकास योजना, स्मारकों का विस्तार और रविदास, कबीर, फुले, वाल्मीकि जैसे संतों को जोड़कर व्यापक सामाजिक संदेश देने की कोशिश है. लक्ष्य है कि बसपा के पारंपरिक वोट में सेंध लगाकर उसे दीर्घकालिक रूप से अपने साथ जोड़ा जाए.
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के सकारात्मक नतीजे न आने के बाद से ही दलित वोट बैंक को सहेजने की कवायद शुरू कर दी थी. इसका बेड़ा खुद संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने उठाया था. उन्होंने इस वर्ग के प्रोफेशनल के बीच उनके कैंपस में जाकर उनके दर्द को समझने का प्रयास किया. कई संगोष्ठियों का आयोजन किया. धर्मपाल खुद कई जिलों में पहुंचे. 45 जिलों में उन्होंने अनुसूचित वर्ग के बीच चल रही योजनाओं के बारे में बताया. इसके बाद टीम भी लगातार संपर्क कर रही है. उसी का नतीजा है कि अंबेडकर जयंती के पहले सरकार ने अंबेडकर मूर्ति विकास योजना की शुरुआत की है.
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी का कहना है कि बीजेपी ने दलित वर्ग के लिए सबसे ज्यादा काम किया है. पुरानी सरकारों ने तो सिर्फ नारे लगाकर इनका वोट लिया है. सपा सरकार ने दलितों का सबसे ज्यादा उत्पीड़न किया है. महापुरुषों के नाम बदलने से लेकर जितने भी अत्याचार के काम थे, सब इन्हीं की सरकार में हुए. जब से बीजेपी सरकार आई है उसका फोकस दलित उत्थान और महापुरुषों को उचित सम्मान रहा है.
बसपा की क्या है कोशिश?
बहुजन समाज पार्टी अपने कोर दलित वोट को बचाने के लिए कैडर को फिर से सक्रिय कर रही है. मायावती की पार्टी गांव-गांव आंबेडकर जयंती और स्थानीय कार्यक्रमों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है. फोकस यह है कि दलित वोट का बिखराव रोका जाए और पारंपरिक बहुजन आधार फिर से एकजुट हो.
सपा की रणनीति क्या है?
समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को और मजबूत कर रही है. अखिलेश यादव की अगुवाई में जयंती कार्यक्रम, संविधान और आरक्षण के मुद्दों को उभारकर दलितों में राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है. मकसद है कि 2024 की तरह व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाकर 2027 में फायदा लिया जाए. सपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक यादव कहते हैं कि बीजेपी का दलित के प्रति प्रेम यह सिर्फ चुनावी प्रेम है. बीजेपी सिंबॉलिक पॉलिटिक्स करती है. इससे समाज का भला नहीं होगा. उससे इसका कोई भला नहीं होगा. उसका भला नौकरियों में आरक्षण बढ़ेगा. उन्हें बराबरी का दर्जा मिलेगा. उप्र में बीजेपी की सरकारों में सिर्फ दलितों के अधिकारों को लूटा गया है. सोशल जस्टिस की लड़ाई सिर्फ सपा लड़ती है. उनके अधिकारों को दिलाने के लिए वह हमेशा आगे बढ़ती रहेगी.
कांग्रेस भी खेल रही दांव
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जमीनी स्तर पर दलित संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रही है. गांव और मोहल्ला स्तर पर पहुंच बनाकर संविधान बचाओ और आरक्षण जैसे मुद्दों के जरिए भरोसा जीतने की रणनीति है. पार्टी अभी सीमित प्रभाव में है, लेकिन धीरे-धीरे अपना आधार विस्तार करने की कोशिश में है. कांग्रेस के प्रवक्ता अंशू अवस्थी ने कहा कि बीजेपी दलितों को लुभाने के लिए सिर्फ चुनावी स्कीम लाती है. इससे उनका उत्थान नहीं होता. जबकि कांग्रेस ने अपनी सरकारों वाले प्रदेशों के लिए अच्छी अच्छी स्कीम और कानून लाए हैं. जिससे उनका भला हुआ है. यह लोग बाबा साहेब के बनाए संविधान को बदलना चाहते हैं. बीजेपी का कोई भी हथकंडा चलेगा नहीं.

