नवाजुद्दीन सिद्दीकी आज हिंदी सिनेमा के दमदार अभिनेताओं में शुमार हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर बेहद संघर्षों से भरा रहा। फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें लंबे समय तक मेहनत और इंतजार करना पड़ा। एक्टिंग में आने से पहले वह गुजरात की एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में केमिस्ट के तौर पर काम करते थे, लेकिन अभिनय के प्रति उनका जुनून उन्हें मुंबई खींच लाया। मायानगरी में उन्होंने कई मुश्किलों का सामना किया और छोटे-छोटे किरदार निभाते हुए धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई। आज उनके जन्मदिन के खास मौके पर उनके केमिस्ट से सफल अभिनेता बनने तक के प्रेरणादायक सफर को याद किया जा रहा है।
केमिस्ट से बने चौकीदार
नवाजुद्दीन सिद्दीकी आज अपना 52वां जन्मदिन मना रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना कस्बे में जन्मे नवाजुद्दीन एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता खेती-किसानी करते थे, लेकिन नवाजुद्दीन के सपने बचपन से ही बड़े थे। वह हमेशा से अभिनेता बनना चाहते थे, हालांकि उस दौर में उनके परिवार में एक्टिंग को करियर के तौर पर नहीं देखा जाता था। उन्होंने हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रेजुएशन किया और इसके बाद नौकरी की तलाश में वडोदरा पहुंच गए। वहां उन्होंने एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में केमिस्ट की नौकरी शुरू की, लेकिन उनका मन हमेशा अभिनय की दुनिया में ही रमा रहा।
नौकरी छोड़ एक्टिंग में रखा कदम
नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने कुछ समय तक नौकरी करने के बाद दिल्ली का रुख किया, जहां उनका झुकाव थिएटर की तरफ बढ़ने लगा। अभिनय के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया और एक्टिंग की बारीकियां सीखीं। हालांकि उस दौर में आर्थिक तंगी उनके लिए बड़ी चुनौती थी, जिसके चलते उन्हें वॉचमैन की नौकरी तक करनी पड़ी। बाद में जब वह मुंबई पहुंचे तो संघर्ष और भी कठिन हो गया। शुरुआती दिनों में उन्हें फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार ही मिले। साल 1999 में सरफरोश में उन्होंने एक छोटे किरदार से शुरुआत की। इसके बाद शूल और मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी फिल्मों में भी नजर आए, लेकिन लंबे समय तक उन्हें वह पहचान नहीं मिल सकी, जिसका वह सपना लेकर मुंबई आए
13 साल का संघर्ष करने के बाद मिली पहचान
नवाजुद्दीन सिद्दीकी को फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिए करीब 13 साल तक कठिन संघर्ष करना पड़ा। लंबे समय तक छोटे-मोटे किरदार निभाने के बाद उन्हें साल 2012 में आई गैंग्स ऑफ वासेपुर से बड़ा ब्रेक मिला। इस फिल्म में उन्होंने फैजल खान का किरदार निभाकर दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। उनका मशहूर डायलॉग ‘बाप का, दादा का, भाई का… सबका बदला लेगा तेरा फैजल’ आज भी लोगों की जुबान पर बना हुआ है। इसके बाद उन्होंने द लंचबॉक्स, बजरंगी भाईजान, रमन राघव 2.0, मंटो और रात अकेली है जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का दम दिखाया। वहीं सेक्रेड गेम्स में उनकी शानदार एक्टिंग को भी दर्शकों ने खूब सराहा।
