दिल्ली दंगों के सात आरोपियों में से पांच को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है, जबकि दो आरोपियों- शरजील इमाम और उमर खालिद को राहत नहीं मिली है. कोर्ट का कहना है कि हमने सभी के मामलों का अलग-अलग परीक्षण किया है. पुलिस की तरफ से जुटाए गए तथ्यों के मुताबिक उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका केंद्रीय है. इन्हें लंबे समय से जेल में रहने के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती. हालांकि कोर्ट ने कहा है कि दोनों ट्रायल कोर्ट में जमानत के लिए अपील कर सकते हैं.
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने सोमवार (5 जनवरी, 2026) को कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) अहम है, इसका हवाला दिया गया है, लेकिन यह अधिकार कानूनी प्रावधानों के परे नहीं है. कोर्ट ने अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरन हैदर, शिफा उर्फ रहमान, शहदाब अहमद और मोहम्मद सलीम को जमानत दे दी है.
बेंच ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि जिन्हें बेल देना जरूरी है, उन पर कड़ी शर्तें लगाई जा सकती हैं. उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका बाकी लोगों से अलग है. उन्होंने कहा कि यह देखना होगा कि क्या सभी को बंद रखना जरूरी है. रिकॉर्ड के हिसाब से सभी आरोपियों की भूमिका एक जैसी नहीं है. कोर्ट ने कहा है कि मुख्य गवाहों के परीक्षण या इस आदेश के एक साल बाद शरजील और उमर खालिद बेल का आवेदन दाखिल कर सकते हैं.
‘गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों को देखना होगा’, सुप्रीम कोर्ट ने कहा
बेंच ने कहा कि हमें देखना होगा कि क्या गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप मजबूत हैं. हमें सभी आरोपियों की भूमिका को लेकर रखे गए तथ्यों पर भी गौर करना होगा. उन्होंने कहा कि संसद ने UAPA की धारा 15 (आतंकवादी गतिविधि) की परिभाषा को सिर्फ बम धमाकों, सशस्त्र हिंसा तक सीमित नहीं रखा है. इसका दायरा व्यापक है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस की दलील है कि UAPA एक विशेष कानून है. यह सिर्फ आतंकवाद तक सीमित नहीं है. कोर्ट ने कहा कि हमारे सामने दलील रखी गई कि याचिकाकर्ता लंबे समय से हिरासत में हैं. फैसले में हमने इसके खिलाफ पुलिस की दलीलों को भी जगह दी है.
5 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं आरोपी
उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरन हैदर, शिफा उर्फ रहमान, शहदाब अहमद और मोहम्मद सलीम साल 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने के आरोप में पांच साल से भी ज्यादा समय से जेल में बंद हैं. कोर्ट ने 10 दिसंबर, 2025 को दलीलें सुनने के बाद जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट उन्हें जमानत देने से इनकार कर चुका है. 2 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने बेल देने से मना कर दिया था, जिसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

