पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर केंद्र और राज्य के टकराव के केंद्र में आ गई है. प्रवर्तन निदेशालय की एक कार्रवाई ने न सिर्फ प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि सियासी मोर्चे पर भी बयानबाजी को तेज कर दिया है. कोलकाता में प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतिकार और IPAC के डायरेक्टर प्रतीक जैन के ठिकानों पर ED की छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री का खुद मौके पर पहुंचना, इस पूरे घटनाक्रम को साधारण कानूनी प्रक्रिया से कहीं आगे ले गया. यह बताता है कि मामला सिर्फ जांच तक सीमित नहीं, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक अर्थ भी निकाले जा रहे हैं.
राज्य में पहले से ही केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका को लेकर तनावपूर्ण माहौल है. ऐसे में मुख्यमंत्री ममता का जांच स्थल पर पहुंचना एक तरह से यह संकेत देता है कि तृणमूल कांग्रेस इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव के रूप में देख रही है. सत्तारूढ़ दल का मानना है कि चुनावी समय में इस तरह की छापेमारी संयोग नहीं हो सकती. यही वजह है कि यह मामला अब कानूनी दायरे से निकलकर खुले राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है.
कौन हैं IPAC के डायरेक्टर प्रतीक जैन?
प्रशांत किशोर भले ही हाल में बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के साथ उतर चुके हों लेकिन साल 2013 में उन्होंने सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गर्वनेंस नाम से एक कंपनी शुरू की थी, जो आई-पैक (I-PAC) यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (Indian Political Action Committee) के रूप में बदल गया. ऐसा नहीं है कि प्रशांत किशोर ने इस कंपनी को अकेले दम पर बड़ा मुकाम दिलाया. उनके साथ प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल कंपनी के को-फाउंडर्स हैं. पीके के बाद ये तीनों पढ़े-लिखे युवा आई-पैक के मुख्य स्तंभ हैं.
प्रतीक जैन की बात करें तो वो बिहार की राजधानी पटना के रहने वाले हैं. उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है. प्रतीक आई-पैक से जुड़ने से पहले डेलोएट इंडिया (Deloitte India) कंपनी में एनालिस्ट भी रह चुके हैं. ट्विटर पर सक्रिय रहने वाले प्रतीक आमतौर पर लोप्रोफाइल रहते हैं.
राजनीति और प्रशासन में प्रतीक जैन की बड़ी पकड़
IPAC के चीफ प्रतीक जैन को राज्य की राजनीति और प्रशासन में बड़ी पकड़ मानी जाती है. वह कई बार नबन्ना (राज्य सचिवालय) जा चुके हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिल चुके हैं. IPAC विधानसभा चुनाव से पहले अलग-अलग सरकारी प्रोजेक्ट्स को लागू करने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के बीच पुल का काम करता है. एक तरफ, जैसे IPAC नियमित रूप से एडमिनिस्ट्रेशन के टॉप अधिकारियों से बातचीत करता है, वैसे ही IPAC टीम भी रूलिंग पार्टी के टॉप लीडर्स में से एक अभिषेक बनर्जी और उनके ऑफिस के साथ करीबी रिश्तों और बातचीत के आधार पर काम करती है. IPAC की टीम विभिन्न विधानसभा केंद्रों में समीक्षा भी कर रही है. विधानसभा चुनाव में तृणमूल के कैंडिडेट कौन होंगे या किसे बाहर रखा जाएगा, यह तय करने में IPAC का रोल काफी अहम होता है.
ईडी की कार्रवाई और जांच का दायरा
केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने कोलकाता में आईपैक (IPAC) के प्रमुख प्रतीक जैन के आवास और कार्यालय पर एक साथ छापेमारी की. सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े एक मामले में की जा रही है. जांच टीम दस्तावेजों की पड़ताल, डिजिटल रिकॉर्ड की समीक्षा और अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं में जुटी है. एजेंसी की ओर से आधिकारिक तौर पर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई, लेकिन छापे की टाइमिंग और दायरे ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
छापे के दौरान ममता बनर्जी का पहुंचना क्यों अहम?
जांच के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का खुद उस स्थान पर पहुंचना, जहां ईडी की टीम काम कर रही थी, अपने आप में असाधारण माना जा रहा है. आमतौर पर किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई के दौरान किसी मुख्यमंत्री की मौजूदगी कम ही देखने को मिलती है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम केंद्र की एजेंसियों को सीधा राजनीतिक संदेश देने के तौर पर देखा जा रहा है. इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाईयों को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच तीखी बयानबाज़ी होती रही है.
ममता ने राजनीतिक उत्पीड़न का लगाया आरोप
ईडी की रेड पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जांच के नाम पर पार्टी के आईटी और रणनीतिक कार्यालयों से दस्तावेज उठाए जा रहे हैं. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक स्क्रिप्ट के तहत हो रही है और इसका मकसद विपक्षी दल को कमजोर करना है. उनके मुताबिक, पार्टी से जुड़े दस्तावेजों और डेटा को बिना पर्याप्त सुरक्षा के जब्त किया गया, जिससे दुरुपयोग की आशंका पैदा होती है.
SIR और डेटा से जुड़ी जताई आशंकाएं
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि एक तरफ SIR के नाम पर मतदाता सूची से नाम हटाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ संवेदनशील डेटा इकट्ठा किया जा रहा है. ममता बनर्जी ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया. उनका कहना था कि यह दोहरा प्रयास देश की चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है.
ममता बनर्जी ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें इस तरह की कार्रवाई की आशंका पहले से थी. इसी वजह से पार्टी से जुड़ा महत्वपूर्ण डिजिटल डेटा और हार्ड डिस्क पहले ही सुरक्षित स्थानों पर रख दिए गए थे. उनका कहना था कि पार्टी की आंतरिक रणनीति और संगठनात्मक कामकाज को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा. कुल मिलाकर, यह पूरा घटनाक्रम आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति को और अधिक तीखा बना सकता है, जहां कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिरोध आमने-सामने दिखाई देंगे.

