BRICS vs. NATO: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ और प्रतिबंध नीति ने खासतौर पर रूस से तेल खरीदने वाले BRICS देशों की चुनौतियां बढ़ा दी हैं, वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध और ग्रीनलैंड विवाद ने NATO को फिर से केंद्र में ला दिया है। आइए जरा BRICS और NATO की तुलना करें कि कौन सा समूह ज्यादा ताकतवर है।
BRICS vs. NATO: द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद शीत युद्ध की शुरुआत हुई थी। इस युद्ध में दुनिया दो हिस्सों में बंट गई थी। एक तरफ था अमेरिका, तो दूसरी तरफ था सोवियत संघ (रूस)। यह युद्ध 12 मार्च 1947 से लेकर सोवियत संघ के बिखरने तक, यानी 26 दिसम्बर 1991 तक चला।
20वीं वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत के दौरान कई वैश्विक समूह यानी ग्लोबल ग्रुप सामने उभर कर आए। इसी दौर में मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर बना, जिसमें अमेरिका, चीन, यूरोप, रूस और भारत जैसी ताकतें अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव बना रही हैं।
ट्रंप ने BRICS देशों की बढ़ाई सिरदर्दी
बात करें मौजूदा समय की तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इस मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर में भी उथल-पुथल मचा रखी है। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के बैनर तले ट्रंप की पॉलिसी दुनिया के लिए सिरदर्दी बन चुकी है। आज के समय ट्रंप किस देश पर कितना टैरिफ लगा दें, यह कहना बहुत मुश्किल है।

हाल ही में ट्रंप ने एक ऐसे बिल को मंजूरी दे दी है, जिससे रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त कार्रवाई की जा सकेगी। दरअसल, भारत, चीन और ब्राजील ऐसे देश हैं जो बड़ी तादाद में रूस से कच्चे तेल खरीदते हैं।
बिल को मंजूरी मिलने के बाद भारत, चीन और ब्राजील पर अमेरिकी टैरिफ बहुत ज्यादा बढ़ सकता है; कुछ मामलों में यह 500 फीसदी तक पहुंच सकता है। यह कदम यूक्रेन युद्ध के बीच रूस पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया है। इस खबर ने भारत सहित दुनियाभर में हलचल मचा दी है। मोटे तौर पर ट्रंप ने BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) की सिरदर्दी बढ़ा दी है।
इससे पहले भी ट्रंप ने धमकी दी थी कि अगर ब्रिक्स ने वैश्विक व्यापार में मुख्य मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर को हटाने की कोशिश की तो उनके निर्यात पर 100 फीसदी शुल्क लगा दिया जाएगा।
सुर्खियों में क्यों है NATO?
वहीं, दूसरी ओर ट्रंप के ग्रीनलैंड को खरीदने के इरादे पर मचे बवाल और रूस-यूक्रेन युद्ध ने NATO को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर अमेरिका की ओर से ग्रीनलैंड पर कंट्रोल की कोशिश हुई तो नाटो टूट जाएगा।
आज के दौर में एक तरफ पश्चिमी देशों का सैन्य गठबंधन NATO है, तो दूसरी ओर उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह BRICS । दोनों को आज वैश्विक ताकत के पैमाने पर आमने- सामने रखकर देखा जा रहा है, लेकिन इनकी शक्ति, भूमिका और उद्देश्य एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
क्या है NATO?
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी NATO की स्थापना 1949 में शीत युद्ध के दौरान हुई थी। इसका मूल सिद्धांत सामूहिक सुरक्षा है यानी किसी एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। आज NATO में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी समेत 32 देश शामिल हैं। यह एक संगठित सैन्य गठबंधन है, जिसके पास साझा कमांड सिस्टम, संयुक्त सैन्य अभ्यास और स्पष्ट रक्षा रणनीति है।
क्या है BRICS?
BRICS की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह समूह वैश्विक पहचान में आया। हाल के वर्षों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया और यूएई जैसे देशों के जुड़ने से इसकी सदस्य संख्या 2024 तक करीब 10 हो गई।
BRICS खुद को एक आर्थिक और रणनीतिक मंच के तौर पर पेश करता है, जिसका मकसद पश्चिमी वर्चस्व वाली वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में संतुलन लाना है।
जनसंख्या और आर्थिक ताकत में BRICS का पलड़ा भारी
अगर सिर्फ आंकड़ों की बात करें तो यहां तस्वीर साफ दिखती है। BRICS की कुल जनसंख्याः लगभग 3.3 अरब, यानी दुनिया की करीब 40% आबादी NATO की कुल जनसंख्या: करीब 95 करोड़, यानी लगभग 12%

आर्थिक रूप से भी BRICS मजबूत
बात करें PPP (क्रय शक्ति समानता) के आधार पर BRICS की GDP की, तो यह करीब 60 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं, NATO देशों की संयुक्त GDP लगभग 40 ट्रिलियन डॉलर है। इसमें अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 28 ट्रिलियन डॉलर मानी जाती है, जबकि BRICS की मजबूती चीन और भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं से आती है।
सैन्य शक्ति में NATO आगे
जहां तक सैन्य ताकत की बात है, यहां NATO का पलड़ा भारी नजर आता है। NATO के पास संयुक्त कमांड, इंटरऑपरेबल फोर्सेज और एडवांस्ड हथियार प्रणाली है। बता दें कि NATO का सामूहिक रक्षा बजट 1 ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा है।

वहीं BRICS देशों के पास बड़ी सेनाएं और परमाणु क्षमता जरूर है, खासकर रूस, चीन और भारत के कारण, लेकिन कोई साझा सैन्य कमांड नहीं है। वहीं, कोई सामूहिक रक्षा संधि भी ब्रिक्स देशों के बीच नहीं है। इसके अलावा कोई एकीकृत युद्ध रणनीति का भी अभाव है।
यही वजह है कि BRICS सैन्य रूप से एक इकाई के तौर पर काम नहीं करता। सबसे बड़ी बात ये है कि दोनों समूहों की रणनीतिक भूमिका भी अलग-अलग है।
NATO का क्या उद्देश्य है?
यूरोप और उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में सुरक्षा, सैन्य प्रतिरोध, संकट के समय त्वरित कार्रवाई
BRICS की भूमिका क्या है?
आर्थिक सहयोग, विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना, बहुध्रुवीय (multipolar) विश्व व्यवस्था की वकालत
गौरतलब है कि BRICS का New Development Bank पश्चिमी संस्थानों के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
तो फिर ज्यादा ताकतवर कौन?
बता दें कि इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप ताकत को कैसे परिभाषित करते हैं।
एक तरफ जहां सैन्य और सुरक्षा ताकत के मामले में NATO आगे है। वहीं, जनसंख्या, बाजार और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव जैसे मुद्दों पर BRICS का पलड़ा भारी है।

